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Shadan Ahsan Marehrvi
log jab muskuraa ke milte hain
log jab muskuraa ke milte hain | लोग जब मुस्कुरा के मिलते हैं
- Shadan Ahsan Marehrvi
लोग
जब
मुस्कुरा
के
मिलते
हैं
कफ़
में
ख़ंजर
छुपा
के
मिलते
हैं
कैसी
सूरत
बना
के
मिलते
हैं
कई
चेहरे
लगा
के
मिलते
हैं
हिज्र
में
उनके
कैसी
गरमाइश
सर्द
झोंके
हवा
के
मिलते
हैं
और
माज़ी
में
कुछ
नहीं
मिलता
चंद
वादे
वफ़ा
के
मिलते
हैं
जल
चुकी
बस्तियों
की
साज़िश
में
कुछ
इरादे
हवा
के
मिलते
हैं
बाद
मुद्दत
बहार
आती
है
पहले
मौसम
ख़ला
के
मिलते
हैं
- Shadan Ahsan Marehrvi
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जहाँ
सारे
हवा
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
वहाँ
भी
हम
दिया
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
Abbas Qamar
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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मेरा
हाथ
पकड़
ले
पागल,
जंगल
है
जितना
भी
रौशन
हो
जंगल,
जंगल
है
Umair Najmi
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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मुझको
बदन
नसीब
था
पर
रूह
के
बग़ैर
उसने
दिया
भी
फूल
तो
ख़ुशबू
निकाल
कर
Ankit Maurya
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"उसके
हाथ
में
फूल
है"
मत
कहिए,
कहिए
उसका
हाथ
है
फूल
को
फूल
बनाने
में
Charagh Sharma
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मैंने
चाहा
भी
कि
फिर
इस
संग-दिल
पे
फूल
उगे
पर
तुम्हारी
रुख़्सती
के
बाद
ये
होता
नहीं
Siddharth Saaz
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हज़ार
बर्क़
गिरे
लाख
आँधियाँ
उट्ठें
वो
फूल
खिल
के
रहेंगे
जो
खिलने
वाले
हैं
Sahir Ludhianvi
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नदी
को
कोसते
हैं
सब
किसी
के
डूब
जाने
पर
नदी
में
डूबते
को
पर
कोई
तिनका
नहीं
देता
Alankrat Srivastava
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ज़िन्दा
होते
हैं
रोज़
मरते
हैं
लोग
पागल
हैं
इश्क़
करते
हैं
हमको
कहनी
है
उन
सेे
बात
वही
बात
कहते
सभी
जो
डरते
हैं
और
डरते
नहीं
किसी
शय
से
उनकी
नाराज़गी
से
डरते
हैं
गुफ़्तगू
उन
सेे
कैसे
की
जाए
बात
करते
हैं
फूल
झड़ते
हैं
डर
ख़ुदास
ज़रा
नहीं
लगता
हिज्र
की
वहशतों
से
डरते
हैं
रोज़
करते
हैं
वस्ल
के
वादे
रोज़
वादे
से
वो
मुकरते
हैं
साफ़
कहते
हैं
बात
हम
फिर
भी
आँखों
में
आपकी
अखरते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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मयकदों
में
तो
आम
पीते
हैं
हम
निगाहों
से
जाम
पीते
हैं
तेरी
तस्वीर
सामने
रखकर
करके
तुझ
सेे
कलाम
पीते
हैं
ग़म-ए-फ़ुर्क़त
में
दो
ही
घूँट
फ़क़त
आप
करते
हैं
नाम
पीते
हैं
आओ
पी
लो
के
सुब्ह
सादिक़
है
आओ
बैठो
है
शाम
पीते
हैं
मैं
ज़माने
को
मय-कदे
सा
लगूँ
आओ
इस
तरह
जाम
पीते
हैं
क़ैद
बोतल
में
हैं
अजब
जलवे
आज
बोतल
तमाम
पीते
हैं
घिर
के
आईं
घटाएँ
सावन
की
कीजे
कुछ
इंतिज़ाम
पीते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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इक
कसक
दिल
में
कहीं
उठती
है
बेसबब
शे'र
नहीं
होता
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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अब
तो
घर
मुझको
घर
नहीं
लगता
दिल
मेरा
इक
पहर
नहीं
लगता
ज़िन्दगी
अब
सज़ा
सी
लगती
है
मौत
से
भी
तो
डर
नहीं
लगता
छोड़
कर
जबसे
तुम
गए
मुर्शिद
अच्छा
अब
रहगुज़र
नहीं
लगता
कैसे
मुमकिन
हो
लौट
आओ
तुम
रेत
में
तो
शजर
नहीं
लगता
वो
जो
इक
पेड़
था
हरा
उस
में
कोई
भी
अब
समर
नहीं
लगता
क़ैदख़ाना
है
घर
तुमारे
बिन
घर
ज़रा
सा
भी
घर
नहीं
लगता
मुन्तक़िल
जब
से
हो
गए
हो
तुम
दिल
हमारा
इधर
नहीं
लगता
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Shadan Ahsan Marehrvi
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गरेबाँ
चाक
अपना
सी
रहे
हैं
मगर
शर्तों
पे
अपनी
जी
रहे
हैं
ख़लिश
ऐसी
है
फुरक़त
में
तुम्हारी
मुसलसल
रात
से
हम
पी
रहे
हैं
नया
इक
दौर
है
आगे
हमारे
गुज़िश्ता
दौर
में
हम
जी
रहे
हैं
मोहब्बत
के
सितम
सब
ज़ब्त
करके
लबों
को
आप
अपने
सी
रहे
हैं
अगर
हो
रिन्द
तो
अंदर
बुला
लो
हो
गर
जो
शेख़
कहना
पी
रहे
हैं
बने
हैं
आबरू
अब
जो
तुम्हारी
कभी
पहलू
में
मेरे
भी
रहे
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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