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Shadan Ahsan Marehrvi
ik kasak dil men kahii uthatii hai
ik kasak dil men kahii uthatii hai | इक कसक दिल में कहीं उठती है
- Shadan Ahsan Marehrvi
इक
कसक
दिल
में
कहीं
उठती
है
बेसबब
शे'र
नहीं
होता
है
- Shadan Ahsan Marehrvi
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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न
आया
ग़म
भी
मोहब्बत
में
साज़गार
मुझे
वो
ख़ुद
तड़प
गए
देखा
जो
बे-क़रार
मुझे
Asad Bhopali
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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उसको
नंबर
देके
मेरी
और
उलझन
बढ़
गई
फोन
की
घंटी
बजी
और
दिल
की
धड़कन
बढ़
गई
Ana Qasmi
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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उसे
बेचैन
कर
जाऊँगा
मैं
भी
ख़मोशी
से
गुज़र
जाऊँगा
मैं
भी
Ameer Qazalbash
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ये
ज़मीं
किस
क़दर
सजाई
गई
ज़िंदगी
की
तड़प
बढ़ाई
गई
आईने
से
बिगड़
के
बैठ
गए
जिन
की
सूरत
जिन्हें
दिखाई
गई
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Sahir Ludhianvi
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जिसने
बेचैनियाँ
दी
हैं
मुझे
बेचैन
रहे
मैंने
रो-रो
के
ख़ुदास
ये
दु'आ
माँगी
है
Shajar Abbas
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वो
तड़प
जाए
इशारा
कोई
ऐसा
देना
उस
को
ख़त
लिखना
तो
मेरा
भी
हवाला
देना
Azhar Inayati
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दश्त
दरिया
दिखाई
देता
है
आब
सहरा
दिखाई
देता
है
देखता
हूँ
जो
चाँद
को
तककर
तेरा
चेहरा
दिखाई
देता
है
अब
तो
हर
मोड़
तेरे
कूँचे
को
मुझ
को
जाता
दिखाई
देता
है
तुझ
को
देखा
न
तूर
पर
मैंने
सिर्फ़
मूसा
दिखाई
देता
है
तेरे
आगे
तो
अब
मुझे
जाना
चाँद
मैला
दिखाई
देता
है
हिज्र
में
ढल
के
तू
भी
तो
वाइज़
मेरे
जैसा
दिखाई
देता
है
दश्त
में
फिरते
ढ़ोकरें
खाता
सिर्फ़
राँझा
दिखाई
देता
है
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Shadan Ahsan Marehrvi
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अब
तो
घर
मुझको
घर
नहीं
लगता
दिल
मेरा
इक
पहर
नहीं
लगता
ज़िन्दगी
अब
सज़ा
सी
लगती
है
मौत
से
भी
तो
डर
नहीं
लगता
छोड़
कर
जबसे
तुम
गए
मुर्शिद
अच्छा
अब
रहगुज़र
नहीं
लगता
कैसे
मुमकिन
हो
लौट
आओ
तुम
रेत
में
तो
शजर
नहीं
लगता
वो
जो
इक
पेड़
था
हरा
उस
में
कोई
भी
अब
समर
नहीं
लगता
क़ैदख़ाना
है
घर
तुम्हारे
बिन
घर
ज़रा
सा
भी
घर
नहीं
लगता
मुन्तक़िल
जब
से
हो
गए
हो
तुम
दिल
हमारा
इधर
नहीं
लगता
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Shadan Ahsan Marehrvi
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वादा-ए-वस्ल
मुझ
से
टूट
गया
मैंने
छोड़ी
न
आम
की
दावत
Shadan Ahsan Marehrvi
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हुस्न
अपना
हिजाब
में
रखना
सारा
जलवा
नक़ाब
में
रखना
मेरी
चाहत
को
छोड़ना
न
कभी
फूल
कोई
किताब
में
रखना
जलपरी
तुमको
लोग
समझेंगे
पाँव
अपना
न
आब
में
रखना
रिन्द
बहके
न
रेहगुज़ारो
में
इतनी
मस्ती
शराब
में
रखना
मेरी
उल्फत
के
तुम
फ़साने
को
इश्क़
की
हर
किताब
में
रखना
जिसकी
ता'बीर
में
हक़ीक़त
हो
ऐसी
तासीर
ख़्वाब
में
रखना
लग
न
जाए
नज़र
हरीफ़ों
की
अपना
चेहरा
नक़ाब
में
रखना
बस
में
तेरे
नहीं
है
अब
शादान
ज़ख़्म
उनके
हिसाब
में
रखना
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Shadan Ahsan Marehrvi
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मुश्किलों
में
क़रार
की
सूरत
कोई
निकले
बहार
की
सूरत
तू
जो
रूठा
है
तो
चमन
में
अब
गुल
भी
निकले
हैं
ख़ार
की
सूरत
रुख़
से
पर्दा
हटा
सबा
उसके
मुझको
दिखला
दे
यार
की
सूरत
मुस्कुरा
कर
किया
सितम
मुझ
पर
उसने
बदली
न
वार
की
सूरत
जब
दवा
कोई
भी
असर
न
करे
काम
करती
है
यार
की
सूरत
बाज़ी-ए-इश्क़
जीत
कर
ज़ाहिद
मैंने
देखी
है
हार
की
सूरत
सूरत-ए-हाल
हैं
मेरे
जैसे
है
वही
ग़मगुसार
की
सूरत
गुल
से
हटती
नहीं
नज़र
शादान
कौन
देखे
है
ख़ार
की
सूरत
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Shadan Ahsan Marehrvi
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