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Shadan Ahsan Marehrvi
waada-e-wasl mujh se toot gaya
waada-e-wasl mujh se toot gaya | वादा-ए-वस्ल मुझ से टूट गया
- Shadan Ahsan Marehrvi
वादा-ए-वस्ल
मुझ
से
टूट
गया
मैंने
छोड़ी
न
आम
की
दावत
- Shadan Ahsan Marehrvi
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तुम
वो
लड़की
मुझे
लगती
तो
नहीं
आम
गोपी
से
जो
राधा
हो
जाए
Shariq Kaifi
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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मोहब्बत
आम
सा
इक
वाक़िआ'
था
हमारे
साथ
पेश
आने
से
पहले
Sarfraz Zahid
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याद
आई
तिरे
पैरों
की
खनकती
पायल
आम
सा
प्रश्न
था
संगीत
किसे
कहते
हैं
Neeraj Neer
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दोस्ती
आम
है
लेकिन
ऐ
दोस्त
दोस्त
मिलता
है
बड़ी
मुश्किल
से
Hafeez Hoshiarpuri
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तेरी
निगाह-ए-नाज़
से
छूटे
हुए
दरख़्त
मर
जाएँ
क्या
करें
बता
सूखे
हुए
दरख़्त
हैरत
है
पेड़
नीम
के
देने
लगे
हैं
आम
पगला
गए
हैं
आपके
चू
में
हुए
दरख़्त
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Varun Anand
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ख़ुद
जिसे
मेहनत
मशक़्क़त
से
बनाता
हूँ
'जमाल'
छोड़
देता
हूँ
वो
रस्ता
आम
हो
जाने
के
बाद
Jamal Ehsani
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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तुम
अगर
सीखना
चाहो
मुझे
बतला
देना
आम
सा
फ़न
तो
कोई
है
नहीं
तोहफ़ा
देना
Jawwad Sheikh
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आदमी
आदमी
का
दुश्मन
है
बेसबब
यकदिली
का
दुश्मन
है
तुम
नहीं
हो
जो
मेरे
साथ
तो
अब
हर
पहर
ज़िन्दगी
का
दुश्मन
है
मिन्नतें
काम
नहीं
आती
अब
दौर
ये
आजज़ी
का
दुश्मन
है
मय
की
मस्ती
से
है
ग़ाफ़िल
अब
तक
मुत्तक़ी
मैकशी
का
दुश्मन
है
और
दुश्मन
वो
किसी
शय
का
नहीं
बस
तेरी
पैरवी
का
दुश्मन
है
गुल
से
उड़ती
हुई
तितली
ने
कहा
ये
चमन
नाज़ुकी
का
दुश्मन
है
काम
करता
ही
नहीं
जाम
के
अब
होश
ये
बेख़ुदी
का
दुश्मन
है
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Shadan Ahsan Marehrvi
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रहगुज़र
पर
चले
अदब
की
जो
उनको
रस्ते
से
ही
उतार
दिया
बुग्ज़
से
भरके
अपने
सीनों
को
हाए
तुमने
अदब
को
मार
दिया
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Shadan Ahsan Marehrvi
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दरमियाँ
फ़ासला
नहीं
होता
तू
अगर
बे-वफ़ा
नहीं
होता
साफ़
कहना
बुरा
नहीं
होता
मुझ
को
फिर
वसवसा
नहीं
होता
तुम
न
आते
अगर
गुलिस्ताँ
में
कोई
भी
गुल
खिला
नहीं
होता
ज़र्रे
ज़र्रे
में
है
ख़ुदा
पिन्हा
कोई
ज़र्रा
ख़ुदा
नहीं
होता
सच
तो
ये
है
कभी
बुराई
से
आदमी
का
भला
नहीं
होता
उन
किताबों
को
हम
नहीं
पढ़ते
जिन
में
ज़िक्र
आपका
नहीं
होता
मुद्दई
इश्क़
मर
भी
जाए
तो
इश्क़
का
खात्मा
नहीं
होता
मुद्दतों
शख़्स
जो
रहा
मुझ
में
उस
सेे
अब
राब्ता
नहीं
होता
तेरे
कूचे
से
जब
गुज़रता
हूँ
मुझको
अपना
पता
नहीं
होता
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Shadan Ahsan Marehrvi
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शे'र
अच्छा
कोई
हुआ
ही
नहीं
ख़ास
कहने
को
कुछ
रहा
ही
नहीं
रूठ
कर
चेहरे
को
जो
फेर
लिया
एक
मिसरा
भी
फिर
हुआ
ही
नहीं
इस
तरह
से
जुदा
हुआ
मुझ
सेे
जैसे
मेरा
कभी
वो
था
ही
नहीं
ढ़ाई
अक्षर
की
बात
मैंने
लिखी
लफ्ज़
उसने
कोई
पढ़ा
ही
नहीं
तुम
बताते
रहे
बुतों
को
ख़ुदा
बुत
ये
कहते
रहे
ख़ुदा
ही
नहीं
राब्ता
जिस
सेे
तुमको
करना
था
शख़्स
वो
मुझ
में
अब
रहा
ही
नहीं
हैं
सुख़नवर
जहाँ
में
और
मगर
मीर
जैसा
कोई
हुआ
ही
नहीं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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हुस्न
अपना
हिजाब
में
रखना
सारा
जलवा
नक़ाब
में
रखना
मेरी
चाहत
को
छोड़ना
न
कभी
फूल
कोई
किताब
में
रखना
जलपरी
तुमको
लोग
समझेंगे
पाँव
अपना
न
आब
में
रखना
रिन्द
बहके
न
रेहगुज़ारो
में
इतनी
मस्ती
शराब
में
रखना
मेरी
उल्फत
के
तुम
फ़साने
को
इश्क़
की
हर
किताब
में
रखना
जिसकी
ता'बीर
में
हक़ीक़त
हो
ऐसी
तासीर
ख़्वाब
में
रखना
लग
न
जाए
नज़र
हरीफ़ों
की
अपना
चेहरा
नक़ाब
में
रखना
बस
में
तेरे
नहीं
है
अब
शादान
ज़ख़्म
उनके
हिसाब
में
रखना
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Shadan Ahsan Marehrvi
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