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Shadan Ahsan Marehrvi
ab to ghar mujhko ghar nahin lagta
ab to ghar mujhko ghar nahin lagta | अब तो घर मुझको घर नहीं लगता
- Shadan Ahsan Marehrvi
अब
तो
घर
मुझको
घर
नहीं
लगता
दिल
मेरा
इक
पहर
नहीं
लगता
ज़िन्दगी
अब
सज़ा
सी
लगती
है
मौत
से
भी
तो
डर
नहीं
लगता
छोड़
कर
जबसे
तुम
गए
मुर्शिद
अच्छा
अब
रहगुज़र
नहीं
लगता
कैसे
मुमकिन
हो
लौट
आओ
तुम
रेत
में
तो
शजर
नहीं
लगता
वो
जो
इक
पेड़
था
हरा
उस
में
कोई
भी
अब
समर
नहीं
लगता
क़ैदख़ाना
है
घर
तुम्हारे
बिन
घर
ज़रा
सा
भी
घर
नहीं
लगता
मुन्तक़िल
जब
से
हो
गए
हो
तुम
दिल
हमारा
इधर
नहीं
लगता
- Shadan Ahsan Marehrvi
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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मु-ए-जुज़
'मीर'
जो
थे
फ़न
के
उस्ताद
यही
इक
रेख़्ता-गो
अब
रहा
है
Mushafi Ghulam Hamdani
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अब
न
निकलूँगा
तेरी
बाँहों
से,
अपनी
हद
में
रहा
करूँँगा
मैं
मेरे
सीने
में
है
मेरा
उस्ताद
इसने
जो
भी
कहा
करूँँगा
मैं
Zubair Ali Tabish
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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शागिर्द
हैं
हम
'मीर'
से
उस्ताद
के
'रासिख़'
उस्तादों
का
उस्ताद
है
उस्ताद
हमारा
Rasikh Azimabadi
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रेख़्ते
के
तुम्हीं
उस्ताद
नहीं
हो
'ग़ालिब'
कहते
हैं
अगले
ज़माने
में
कोई
'मीर'
भी
था
Mirza Ghalib
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वही
शागिर्द
फिर
हो
जाते
हैं
उस्ताद
ऐ
'जौहर'
जो
अपने
जान-ओ-दिल
से
ख़िदमत-ए-उस्ताद
करते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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रहबर
भी
ये
हमदम
भी
ये
ग़म-ख़्वार
हमारे
उस्ताद
ये
क़ौमों
के
हैं
में'मार
हमारे
Unknown
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देखा
न
कोहकन
कोई
फ़रहाद
के
बग़ैर
आता
नहीं
है
फ़न
कोई
उस्ताद
के
बग़ैर
Unknown
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महरूम
हूँ
मैं
ख़िदमत-ए-उस्ताद
से
'मुनीर'
कलकत्ता
मुझ
को
गोर
से
भी
तंग
हो
गया
Muneer Shikohabadi
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हो
गई
अब
विदा
तेरी
चाहत
उसकी
तस्वीर
भी
जला
देना
Shadan Ahsan Marehrvi
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जो
भी
कहने
को
मीर
कहते
हैं
बात
उतनी
वज़ीर
कहते
हैं
मुत्तक़ी
करके
दीन
का
सौदा
ख़ुद
को
अहले
ज़मीर
कहते
हैं
बादशाहों
से
कम
नहीं
रुतबा
आप
ख़ुद
को
फ़क़ीर
कहते
हैं
लोग
आकर
फ़रेब
की
ज़द
में
बुत-परस्तों
को
पीर
कहते
हैं
इश्क़
हो
आरज़ी
तो
मत
करना
बात
इतनी
कबीर
कहते
हैं
इश्क़
की
डोर
से
यूँँ
बाँधा
है
लोग
मुझको
असीर
कहते
हैं
एक
मिसरा
तो
कह
के
दिखलाओ
जिस
तरह
शे'र
मीर
कहते
हैं
पीर
मेरा
अली
है
लासानी
पीर
भी
जिसको
मीर
कहते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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रोग
दिल
का
बड़ा
ही
सरकश
है
ये
सितम
नाज़-ए-तर्ज़-ए-महवश
है
है
नज़र
शोख़
की
मेरे
दिल
पर
और
हाथों
में
उसके
तरकश
है
राज़
हस्ती
के
ये
ख़ुदा
जाने
कौन
सूफ़ी
है
कौन
मयकश
है
राज़
मजनू
ने
ये
कहा
सब
सेे
हाए
उल्फत
बड़ी
ही
सरकश
है
है
तिलावत
में
कैफ़
किस
दर्जा
आज
मस्जिद
में
कोई
मयकश
है
है
नुमाया
जो
अक्स
परदे
में
ये
नज़ारा
भी
ख़ूब
दिलकश
है
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Shadan Ahsan Marehrvi
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रंज-ओ-ग़म
जिन
में
मुब्तला
था
दिल
उनकी
तफ़्तीश
कर
रहा
हूँ
मैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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शे'र
अच्छा
कोई
हुआ
ही
नहीं
ख़ास
कहने
को
कुछ
रहा
ही
नहीं
रूठ
कर
चेहरे
को
जो
फेर
लिया
एक
मिसरा
भी
फिर
हुआ
ही
नहीं
इस
तरह
से
जुदा
हुआ
मुझ
सेे
जैसे
मेरा
कभी
वो
था
ही
नहीं
ढ़ाई
अक्षर
की
बात
मैंने
लिखी
लफ्ज़
उसने
कोई
पढ़ा
ही
नहीं
तुम
बताते
रहे
बुतों
को
ख़ुदा
बुत
ये
कहते
रहे
ख़ुदा
ही
नहीं
राब्ता
जिस
सेे
तुमको
करना
था
शख़्स
वो
मुझ
में
अब
रहा
ही
नहीं
हैं
सुख़नवर
जहाँ
में
और
मगर
मीर
जैसा
कोई
हुआ
ही
नहीं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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