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Shadan Ahsan Marehrvi
rog dil ka badaa hi sarkash hai
rog dil ka badaa hi sarkash hai | रोग दिल का बड़ा ही सरकश है
- Shadan Ahsan Marehrvi
रोग
दिल
का
बड़ा
ही
सरकश
है
ये
सितम
नाज़-ए-तर्ज़-ए-महवश
है
है
नज़र
शोख़
की
मेरे
दिल
पर
और
हाथों
में
उसके
तरकश
है
राज़
हस्ती
के
ये
ख़ुदा
जाने
कौन
सूफ़ी
है
कौन
मयकश
है
राज़
मजनू
ने
ये
कहा
सब
सेे
हाए
उल्फत
बड़ी
ही
सरकश
है
है
तिलावत
में
कैफ़
किस
दर्जा
आज
मस्जिद
में
कोई
मयकश
है
है
नुमाया
जो
अक्स
परदे
में
ये
नज़ारा
भी
ख़ूब
दिलकश
है
- Shadan Ahsan Marehrvi
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कोई
पागल
ही
मोहब्बत
से
नवाज़ेगा
मुझे
आप
तो
ख़ैर
समझदार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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ईद
के
बा'द
वो
मिलने
के
लिए
आए
हैं
ईद
का
चाँद
नज़र
आने
लगा
ईद
के
बा'द
Unknown
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हम
जिसे
देखते
रहते
थे
उम्र
भर
काश
वो
इक
नज़र
देखता
हम
को
भी
Mohsin Ahmad Khan
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हम
भी
ख़ुद
को
तबाह
कर
लेते
तुम
इधर
भी
निगाह
कर
लेते
Behzad Lakhnavi
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दिल्ली
के
न
थे
कूचे
औराक़-ए-मुसव्वर
थे
जो
शक्ल
नज़र
आई
तस्वीर
नज़र
आई
Meer Taqi Meer
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सफ़र
के
ब'अद
भी
मुझ
को
सफ़र
में
रहना
है
नज़र
से
गिरना
भी
गोया
ख़बर
में
रहना
है
Aadil Raza Mansoori
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बोसा
देते
नहीं
और
दिल
पे
है
हर
लहज़ा
निगाह
जी
में
कहते
हैं
कि
मुफ़्त
आए
तो
माल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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बात
इतनी
सी
है
मेरे
हम
दम
तू
नज़र
आया
जब
जिधर
देखा
D Faiz Khan
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जो
भी
कहने
को
मीर
कहते
हैं
बात
उतनी
वज़ीर
कहते
हैं
मुत्तक़ी
करके
दीन
का
सौदा
ख़ुद
को
अहले
ज़मीर
कहते
हैं
बादशाहों
से
कम
नहीं
रुतबा
आप
ख़ुद
को
फ़क़ीर
कहते
हैं
लोग
आकर
फ़रेब
की
ज़द
में
बुत-परस्तों
को
पीर
कहते
हैं
इश्क़
हो
आरज़ी
तो
मत
करना
बात
इतनी
कबीर
कहते
हैं
इश्क़
की
डोर
से
यूँँ
बाँधा
है
लोग
मुझको
असीर
कहते
हैं
एक
मिसरा
तो
कह
के
दिखलाओ
जिस
तरह
शे'र
मीर
कहते
हैं
पीर
मेरा
अली
है
लासानी
पीर
भी
जिसको
मीर
कहते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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ज़िन्दा
होते
हैं
रोज़
मरते
हैं
लोग
पागल
हैं
इश्क़
करते
हैं
हमको
कहनी
है
उन
सेे
बात
वही
बात
कहते
सभी
जो
डरते
हैं
और
डरते
नहीं
किसी
शय
से
उनकी
नाराज़गी
से
डरते
हैं
गुफ़्तगू
उन
सेे
कैसे
की
जाए
बात
करते
हैं
फूल
झड़ते
हैं
डर
ख़ुदास
ज़रा
नहीं
लगता
हिज्र
की
वहशतों
से
डरते
हैं
रोज़
करते
हैं
वस्ल
के
वादे
रोज़
वादे
से
वो
मुकरते
हैं
साफ़
कहते
हैं
बात
हम
फिर
भी
आँखों
में
आपकी
अखरते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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मुझे
ख़बर
नहीं
ग़म
क्या
है
और
ख़ुशी
क्या
है
ये
ज़िंदगी
की
है
सूरत
तो
ज़िंदगी
क्या
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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अँधेरे
और
काले
हो
गए
हैं
मेरे
दुश्मन
उजाले
हो
गए
हैं
चमन
को
छोड़कर
जब
से
गए
हो
हरे
पत्ते
भी
काले
हो
गए
हैं
तेरी
चाहत
में
पढ़कर
सब
बिरागी
मोहब्बत
करने
वाले
हो
गए
हैं
बहुत
लागत
ग़ज़ल
में
लग
रही
है
के
अब
रोटी
के
लाले
हो
गए
हैं
ज़रा
सा
जो
हुआ
बेख़ुद
तो
मेरे
मुख़ालिफ़
होश
वाले
हो
गए
हैं
करम
की
जिस
सेे
की
हमने
गुज़ारिश
वो
बादल
और
काले
हो
गए
हैं
तेरी
ही
हिज्र
की
वीरानियों
से
मेरे
कमरे
में
जाले
हो
गए
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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ज़बाने
दाग़
में
मैंने
उसे
लिखी
चिट्ठी
मिज़ाजे
मीर
में
उसने
मुझे
जवाब
दिया
Shadan Ahsan Marehrvi
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