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Shadan Ahsan Marehrvi
takaaze jo nibhaate raaston ke
takaaze jo nibhaate raaston ke | तकाज़े जो निभाते रास्तों के
- Shadan Ahsan Marehrvi
तकाज़े
जो
निभाते
रास्तों
के
तो
टल
सकते
थे
मंज़र
हादसों
के
ठिकाने
ढूँढने
में
सूफियों
के
मैं
ज़द
में
आ
गया
हूँ
कूफ़ियों
के
मसीहा
जब
तलक
भेजे
न
यज़दाँ
दीए
बुझते
नहीं
हैं
ज़ुल्मतों
के
जो
मसनद
पे
यहाँ
बैठा
है
हाकिम
नहीं
सुनता
है
नाले
बेकसों
के
बज़ाहिर
करके
ईमाँ
का
दिखावा
लबादे
ओढ़े
हमने
मोमिनों
के
तुझे
चाहा
परखना
तब
ये
जाना
कि
ज़द
में
आ
गया
हूँ
वसवसों
के
मेरा
लाशा
उठाए
फिर
रहे
हैं
बदलते
काँधे
मेरे
दोस्तों
के
मुसलसल
गूंगे
रहकर
एक
अर्सा
सितम
सहते
रहे
हम
बामनों
के
- Shadan Ahsan Marehrvi
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सुख़न
का
जोश
कम
होता
नहीं
है
वगरना
क्या
सितम
होता
नहीं
है
भले
तुम
काट
दो
बाज़ू
हमारे
क़लम
का
सर
क़लम
होता
नहीं
है
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Baghi Vikas
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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अक्सर
ही
ज़ख़्म
इश्क़
में
पाले
हैं
औरतें
पर
कितने
टूटे
मर्द
सँभाले
हैं
औरतें
Abhishar Geeta Shukla
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मैं
चोट
कर
तो
रहा
हूँ
हवा
के
माथे
पर
मज़ा
तो
जब
था
कि
कोई
निशान
भी
पड़ता
Abhishek shukla
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हाथ
काँटों
से
कर
लिए
ज़ख़्मी
फूल
बालों
में
इक
सजाने
को
Ada Jafarey
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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ठीक
से
ज़ख़्म
का
अंदाज़ा
किया
ही
किसने
बस
सुना
था
कि
बिछड़ते
हैं
तो
मर
जाते
हैं
Shariq Kaifi
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ये
बात
अभी
सबको
समझ
आई
नहीं
है
दीवाना
है
दीवाना
तमन्नाई
नहीं
है
दिल
मेरा
दुखाकर
ये
मुझे
तेरा
मनाना
मरहम
है
फ़क़त
ज़ख़्म
की
भरपाई
नहीं
है
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Vikram Gaur Vairagi
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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शाख़-दर-शाख़
होती
है
ज़ख़्मी
जब
परिंदा
शिकार
होता
है
Indira Varma
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ज़िंदगानी
जब
कहानी
हो
गई
वो
कहानी
ख़ुद
पुरानी
हो
गई
ज़िन्दगी
ने
जो
मुसर्रत
पाई
थी
वो
ख़ुशी
आँखों
का
पानी
हो
गई
जान
दी
दिल
दे
दिया
सौदा
किया
बात
उल्फ़त
की
ज़बानी
हो
गई
बात
उसने
रास्ते
में
जब
न
की
में
ये
समझा
वो
सियानी
हो
गई
दाग़
दामन
पर
हमारे
जो
लगे
क्या
ये
उल्फत
की
निशानी
हो
गई
उनके
आने
से
हुआ
मसरूर
मैं
ज़िन्दगी
की
मेहरबानी
हो
गई
इश्क़
ने
फेरा
तसव्वुर
जब
मेरा
तब
ज़मीं
भी
आसमानी
हो
गई
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Shadan Ahsan Marehrvi
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ज़िंदा
होते
हैं
रोज़
मरते
हैं
लोग
पागल
हैं
इश्क़
करते
हैं
Shadan Ahsan Marehrvi
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सींचते
ख़ून
से
रहे
मक़्तल
तपते
सेहरा
में
वो
ख़ुदा
वाले
इन
निगाहों
में
बेश्तर
मेरी
क़ैद
मंज़र
हैं
करबला
वाले
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Shadan Ahsan Marehrvi
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लेट
उठते
हैं
लेट
सोते
हैं
कुछ
अदीबों
में
ऐब
होते
हैं
जिनको
मौला
अता
सुख़न
करदे
उन
फ़क़ीरों
के
ऐश
होते
हैं
सौ-सौ
शहनाइयाँ
बजें
फिर
भी
सिसकियाँ
भर
के
लोग
रोते
हैं
दूर
जाते
हैं
जब
भी
वो
मुझ
सेे
और
मेरे
क़रीब
होते
हैं
आए
बरसात
तो
मिले
राहत
ऐसे
बादल
तो
रोज़
होते
हैं
कौन
ज़ंजीर
पाँव
की
तोड़े
चैन
से
हम
क़फ़स
में
सोते
हैं
याद
करते
हैं
गांव
की
गालियाँ
और
ज़ार-ओ-क़तार
रोते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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ज़र्फ
किसका
क्या
है
तब
मालूम
हो
हाथ
में
देकर
के
पत्थर
देखिये
Shadan Ahsan Marehrvi
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