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Shadan Ahsan Marehrvi
late uthte hain late sote hain
late uthte hain late sote hain | लेट उठते हैं लेट सोते हैं
- Shadan Ahsan Marehrvi
लेट
उठते
हैं
लेट
सोते
हैं
कुछ
अदीबों
में
ऐब
होते
हैं
जिनको
मौला
अता
सुख़न
करदे
उन
फ़क़ीरों
के
ऐश
होते
हैं
सौ-सौ
शहनाइयाँ
बजें
फिर
भी
सिसकियाँ
भर
के
लोग
रोते
हैं
दूर
जाते
हैं
जब
भी
वो
मुझ
सेे
और
मेरे
क़रीब
होते
हैं
आए
बरसात
तो
मिले
राहत
ऐसे
बादल
तो
रोज़
होते
हैं
कौन
ज़ंजीर
पाँव
की
तोड़े
चैन
से
हम
क़फ़स
में
सोते
हैं
याद
करते
हैं
गांव
की
गालियाँ
और
ज़ार-ओ-क़तार
रोते
हैं
- Shadan Ahsan Marehrvi
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तुम्हारी
याद
के
दो
चार
सिक्के
हज़ारों
बार
दिन
में
गिन
रहा
हूँ
Umesh Maurya
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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तेरी
यादों
की
धूप
आने
लगी
है
अभी
खुल
जाएगा
मौसम
हमारा
Subhan Asad
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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इतना
तो
याद
है
इक
वा'दा
किया
था
लेकिन
हम
ने
क्या
वा'दा
किया
था
हमें
ये
याद
नहीं
Bismil Dehlavi
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उस
की
यादों
की
काई
पर
अब
तो
ज़िंदगी-भर
मुझे
फिसलना
है
Siraj Faisal Khan
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इक
वही
शख़्स
मुझ
को
याद
रहा
जिस
को
समझा
था
भूल
जाऊँगा
Salman Akhtar
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आप
की
याद
आती
रही
रात
भर
चश्म-ए-नम
मुस्कुराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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कितने
नादाँ
हैं
तेरे
भूलने
वाले
कि
तुझे
याद
करने
के
लिए
उम्र
पड़ी
हो
जैसे
Ahmad Faraz
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ख़ुद
को
मसरूफ़
किए
रखने
की
कोशिश
करना
क्या
तेरी
याद
के
ज़ुमरे
में
नहीं
आता
है
Jawwad Sheikh
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मसअले
इश्क़
के
मैं
हल
कर
दूँ
जज़्बा-ए-दिल
में
जो
बदल
कर
दूँ
तेरी
रंगत
में
ढाल
कर
मिसरे
तुझ
सेे
मंसूब
इक
ग़ज़ल
कर
दूँ
वहशत-ए-हिज्र
है
मुझे
दरपेश
कैसे
मुमकिन
है
इसको
हल
कर
दूँ
शे'र
मंसूब
जो
न
हों
तुझ
सेे
उन
में
पैदा
कोई
ख़लल
कर
दूँ
वक़्त
से
जो
मिले
हसीं
लम्हें
नाम
तेरे
वो
सारे
पल
कर
दूँ
तू
जो
कह
दे
तो
फिर
तेरी
ख़ातिर
मैं
भी
तामीर
इक
महल
कर
दूँ
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Shadan Ahsan Marehrvi
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मैं
जो
वहशत
से
ऊब
जाऊँगा
मौजे
दरया
में
डूब
जाऊँगा
कितनी
गहरी
हैं
कत्थई
आँखें
इन
निगाहों
में
डूब
जाऊँगा
इस
क़दर
चाहेगी
जो
तू
मुझको
तेरी
चाहत
से
ऊब
जाऊँगा
लाख
मुझ
पर
भले
लगे
तोहमत
कू-ए-जानाँ
में
ख़ूब
जाऊँगा
ना
ख़ुदा
को
अगर
ख़ुदा
समझूँ
इस
सेे
अच्छा
मैं
डूब
जाऊँगा
इश्क़
की
मौज
तेज़
है
शादान
मैं
जो
तैरा
तो
डूब
जाऊँगा
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गरेबाँ
चाक
अपना
सी
रहे
हैं
मगर
शर्तों
पे
अपनी
जी
रहे
हैं
ख़लिश
ऐसी
है
फुरक़त
में
तुम्हारी
मुसलसल
रात
से
हम
पी
रहे
हैं
नया
इक
दौर
है
आगे
हमारे
गुज़िश्ता
दौर
में
हम
जी
रहे
हैं
मोहब्बत
के
सितम
सब
ज़ब्त
करके
लबों
को
आप
अपने
सी
रहे
हैं
अगर
हो
रिन्द
तो
अंदर
बुला
लो
हो
गर
जो
शेख़
कहना
पी
रहे
हैं
बने
हैं
आबरू
अब
जो
तुम्हारी
कभी
पहलू
में
मेरे
भी
रहे
हैं
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रंज-ओ-ग़म
जिन
में
मुब्तला
था
दिल
उनकी
तफ़्तीश
कर
रहा
हूँ
मैं
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बज़ाहिर
जो
हिमायत
कर
रहे
हैं
वही
पीछे
बग़ावत
कर
रहे
हैं
पता
ग़ैरों
से
ये
मुझको
चला
है
मेरे
अपने
अदावत
कर
रहे
हैं
बहुत
दिन
बाद
लौटा
हूँ
जो
घर
तो
तेरे
तेवर
शिकायत
कर
रहे
हैं
वही
पलकें
तुम्हारी
कह
रही
हैं
वही
गेसू
शिकायत
कर
रहे
हैं
ख़ुदा
का
शुक्र
है
अच्छे
सुख़नवर
मेरे
शे'रों
पे
हैरत
कर
रहे
हैं
बहुत
ही
एहतियातों
को
बरतना
मोहब्बत
में
नसीहत
कर
रहे
हैं
ये
सौदागर
क़यामत
से
डराकर
ख़ुदा
की
अब
तिजारत
कर
रहे
हैं
कोई
हक़
पर
हो
तो
सर
को
कटाए
ये
नेज़े
फिर
से
हसरत
कर
रहे
हैं
अमीर-ए-शहर
के
क़िस्से
सुना
कर
नई
नस्लों
को
ग़ारत
कर
रहे
हैं
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