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Shadan Ahsan Marehrvi
gham musalsal hai raabta kam hai
gham musalsal hai raabta kam hai | ग़म मुसलसल है राब्ता कम है
- Shadan Ahsan Marehrvi
ग़म
मुसलसल
है
राब्ता
कम
है
हाए
तब्दीलियों
का
मौसम
है
चाक
दामन
है
इश्क़
में
मेरा
हाल
मजनू
से
क़ैस
से
कम
है
बस
के
दीदार
की
तमनना
है
आँख
इस
शौक़
में
मेरी
नम
है
न
कहूँ
कुछ
अगर
तो
है
अच्छा
बात
जितनी
भी
मैं
करुँ
कम
है
कैसे
भर
दे
वो
ज़ख़्म
उल्फ़त
के
चारा-गर
भी
तो
इबने
आदम
है
शब
-ए-
हिजरां
का
हो
पहर
जैसे
ज़ुल्फ़
वल्लेल
में
जो
ये
ख़म
है
तुझ
से
मन्सूब
हैं
बहारें
सब
और
जो
तू
नहीं
तो
मातम
है
वो
अता
कीं
हैं
नेमतें
या
रब
उम्र
भर
सजदे
में
रहूँ
कम
है
- Shadan Ahsan Marehrvi
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इक
उम्र
कट
गई
है
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐसे
भी
हैं
कि
कट
न
सकी
जिन
से
एक
रात
Firaq Gorakhpuri
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सुब्ह
होती
है
शाम
होती
है
उम्र
यूँँही
तमाम
होती
है
Munshi Amirullah Tasleem
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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कोई
सवाल
ज़िंदगी
का
हल
नहीं
हुआ
पढ़ने
में
सारी
उम्र
गवांने
के
बावजूद
Ankit Maurya
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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दिल
ये
करता
है
कि
इस
उम्र
की
पगडंडी
पर
उलटे
पैरों
से
चलूँ
फिर
वही
लड़का
हो
जाऊँ
Mehshar Afridi
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आख़िर
को
हँस
पड़ेंगे
किसी
एक
बात
पर
रोना
तमाम
उम्र
का
बे-कार
जाएगा
Khursheed Rizvi
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तर्जुबा
था
सो
दु'आ
की
के
नुकसान
ना
हो
इश्क़
मजदूर
को
मजदूरी
के
दौरान
ना
हो
मैं
उसे
देख
ना
पाता
था
परेशानी
में
सो
दु'आ
करता
था
मर
जाए
परेशान
ना
हो
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Afkar Alvi
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क्या
हुआ
जो
मुझे
हम-उम्र
मोहब्बत
न
मिली
मेरी
ख़्वाहिश
भी
यही
थी
कि
बड़ी
आग
लगे
Muzdum Khan
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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हैं
लहू
से
कई
गुना
बढ़कर
वो
जो
एहसास
के
मरासिम
हैं
Shadan Ahsan Marehrvi
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मसअले
इश्क़
के
मैं
हल
कर
दूँ
जज़्बा-ए-दिल
में
जो
बदल
कर
दूँ
तेरी
रंगत
में
ढाल
कर
मिसरे
तुझ
सेे
मंसूब
इक
ग़ज़ल
कर
दूँ
वहशत-ए-हिज्र
है
मुझे
दरपेश
कैसे
मुमकिन
है
इसको
हल
कर
दूँ
शे'र
मंसूब
जो
न
हों
तुझ
सेे
उन
में
पैदा
कोई
ख़लल
कर
दूँ
वक़्त
से
जो
मिले
हसीं
लम्हें
नाम
तेरे
वो
सारे
पल
कर
दूँ
तू
जो
कह
दे
तो
फिर
तेरी
ख़ातिर
मैं
भी
तामीर
इक
महल
कर
दूँ
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वादा-ए-वस्ल
मुझ
से
टूट
गया
मैंने
छोड़ी
न
आम
की
दावत
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दश्त
दरिया
दिखाई
देता
है
आब
सहरा
दिखाई
देता
है
देखता
हूँ
जो
चाँद
को
तककर
तेरा
चेहरा
दिखाई
देता
है
अब
तो
हर
मोड़
तेरे
कूँचे
को
मुझ
को
जाता
दिखाई
देता
है
तुझ
को
देखा
न
तूर
पर
मैंने
सिर्फ़
मूसा
दिखाई
देता
है
तेरे
आगे
तो
अब
मुझे
जाना
चाँद
मैला
दिखाई
देता
है
हिज्र
में
ढल
के
तू
भी
तो
वाइज़
मेरे
जैसा
दिखाई
देता
है
दश्त
में
फिरते
ढ़ोकरें
खाता
सिर्फ़
राँझा
दिखाई
देता
है
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तकाज़े
जो
निभाते
रास्तों
के
तो
टल
सकते
थे
मंज़र
हादसों
के
ठिकाने
ढूँढने
में
सूफियों
के
मैं
ज़द
में
आ
गया
हूँ
कूफ़ियों
के
मसीहा
जब
तलक
भेजे
न
यज़दाँ
दीए
बुझते
नहीं
हैं
ज़ुल्मतों
के
जो
मसनद
पे
यहाँ
बैठा
है
हाकिम
नहीं
सुनता
है
नाले
बेकसों
के
बज़ाहिर
करके
ईमाँ
का
दिखावा
लबादे
ओढ़े
हमने
मोमिनों
के
तुझे
चाहा
परखना
तब
ये
जाना
कि
ज़द
में
आ
गया
हूँ
वसवसों
के
मेरा
लाशा
उठाए
फिर
रहे
हैं
बदलते
काँधे
मेरे
दोस्तों
के
मुसलसल
गूंगे
रहकर
एक
अर्सा
सितम
सहते
रहे
हम
बामनों
के
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