jism se raahguzaar banaate hain | जिस्म से रहगुज़र बनाते हैं

  - Sabahat Urooj
जिस्मसेरहगुज़रबनातेहैं
मोहब्बतकोशरबनातेहैं
सिर्फ़दीवार-ओ-दरबनातेहैं
औरदावाहैघरबनातेहैं
ख़ुदकोबार-ए-दिगरबनातेहैं
औरअबसोचकरबनातेहैं
आजलकड़ीकेजोड़करतख़्ते
डूबजानेकाडरबनातेहैं
जिनकेपाँववोकाटलेतेहैं
उनकेजिस्मोंपेसरबनातेहैं
येलुटेरेहीमेरेमोहसिनहैं
बंदगलियोंमेंदरबनातेहैं
उसनेउड़नाहैऔरसम्तोंमें
आइएबाल-ओ-परबनातेहैं
हमनेजानानहींकहींभीतू
क्यूँयेराह-ए-सफ़रबनातेहैं
अब'सबाहत'ख़ुदाबनेहैंवो
अबवोशम्स-ओ-क़मरबनातेहैं
  - Sabahat Urooj
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