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Atul K Rai
kabhi manzil kabhi rastaa lagega
kabhi manzil kabhi rastaa lagega | कभी मंज़िल कभी रस्ता लगेगा
- Atul K Rai
कभी
मंज़िल
कभी
रस्ता
लगेगा
नहीं
मानोगे
तो
सदमा
लगेगा
तेरे
दर
पर
तेरी
ख़ातिर
बता
ना
हमें
रोना
पड़े
अच्छा
लगेगा
कहानी
अब
सुनो
संज़ीदगी
से
ग़ज़ल
छोड़ो
यहाँ
भद्दा
लगेगा
लबों
से
चूमकर
जो
तुम
खिला
दो
वही
बिस्किट
हमें
खस्ता
लगेगा
चले
आए
टपोरी
क्लास
करने
नहीं
मालूम
था
बस्ता
लगेगा
बहुत
महँगा
पड़ा
है
हिज्र
हमको
बहुत
लोगों
को
ये
सस्ता
लगेगा
ज़बरदस्ती
नहीं
है
यार
लेकिन
चले
आओ
बड़ा
अच्छा
लगेगा
कहानी
से
हमें
बर्ख़ास्त
कर
दो
वही
किरदार
बस
सच्चा
लगेगा
- Atul K Rai
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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सखियों
संग
रँगने
की
धमकी
सुनकर
क्या
डर
जाऊँगा
तेरी
गली
में
क्या
होगा
ये
मालूम
है
पर
आऊँगा
Kumar Vishwas
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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तुम
पर
इक
दिन
मरते
मरते
मर
जाना
है,
दीवाने
को
कहाँ
ख़बर
है
घर
जाना
है
एक
शब्द
तुमको
अंधेरे
का
खौफ़
दिलाकर,
बाद
में
ख़ुद
भी
जान
बूझकर
डर
जाना
है
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Vishal Singh Tabish
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इस
दर
का
हो
या
उस
दर
का
हर
पत्थर
पत्थर
है
लेकिन
कुछ
ने
मेरा
सर
फोड़ा
हैं
कुछ
पर
मैं
ने
सर
फोड़ा
है
Zubair Ali Tabish
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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हम
किसी
दर
पे
न
ठिटके
न
कहीं
दस्तक
दी
सैकड़ों
दर
थे
मिरी
जाँ
तिरे
दर
से
पहले
Ibn E Insha
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धर्म
के
रस्ते
पे
चलिए
धैर्य
रखिए
और
फिर
जीत
कर
लंका
अयोध्या
लौटिए
आराम
से
Atul K Rai
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ज़बरदस्ती
नहीं
है
यार
लेकिन
चले
आओ
बड़ा
अच्छा
लगेगा
Atul K Rai
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रूह
घर
पर
ही
भूल
आया
था
हम
निहत्थे
पे
वार
क्या
करते
Atul K Rai
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तेरे
दर
पर
तेरी
ख़ातिर
बता
ना
हमें
रोना
पड़े,
अच्छा
लगेगा?
Atul K Rai
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न
जाने
चाँद
कब
लौटेगा
छत
पर
न
जाने
कब
हमारी
ईद
होगी
Atul K Rai
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