khizaan ke zakham hawa ki mahak se bharne lage | ख़िज़ाँ के ज़ख़्म हवा की महक से भरने लगे

  - Rafiq Khawar Jaskani
ख़िज़ाँकेज़ख़्महवाकीमहकसेभरनेलगे
निगार-ए-गुलकेख़द-ओ-ख़ालफिरनिखरनेलगे
येसूखेसह
मेंशजरदेखमार्चआनेपर
तेरेबदनकीतरहशाख़शाख़भरनेलगे
ग़म-ए-हयातफिरआनेलगीसदा-ए-जरस
दयार-ए-शबसेतिरेक़ाफ़िलेगुज़रनेलगे
उदासरातकेदरवाज़ेवाहैंजैसेअभी
दर-ए-निगाहसेदिलमेंकोईउतरनेलगे
सराब-ए-दश्त-ए-तमन्नासेकौनगुज़राहै
किचश्मा-ए-ग़म-ए-दिलबूँदबूँदझरनेलगे
येझिलमिलातेसितारेयेज़ख़्म-ए-सीना-ए-शब
उफ़ुक़केपहलेउजालेसेजैसेभरनेलगे
नुजूम-ए-शबकीज़बाँपरहैगुफ़्ता-ए-'इक़बाल'
वोफिरसेआदम-ए-ख़ाकीकीबातकरनेलगे
ज़मींसेदूरभीअबनक़्श-ए-पा-ए-इंसाँसे
कईजहानख़लामेंनएउभरनेलगे
वोअब्र-ए-राह-गुज़रकीतहोंमेंडूबाचाँद
हवाचलेतोअभीतैरकरउभरनेलगे
हैउसकेअक्सकीतज्सीममेरेफ़नसेवरा
वोआइनेकिसदाकीतरहबिखरनेलगे
वोअब्रहोकिधनकहोकोईतोहो'ख़ावर'
फ़ज़ाकेशानेपेजोज़ुल्फ़सासँवरनेलगे
  - Rafiq Khawar Jaskani
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