bikhra ke ham ghubaar sa wahm-o-khayaal par | बिखरा के हम ग़ुबार सा वहम-ओ-ख़याल पर

  - Rafiq Khawar Jaskani
बिखराकेहमग़ुबारसावहम-ओ-ख़यालपर
पत्तोंकीतरहडोलतेफिरतेहैंमालपर
अपनेहीपाँवबसमेंनहींऔरयारलोग
तन्क़ीदकररहेहैंसितारोंकीचालपर
येमालआँचलोंकासुबुकसारआबशार
सद-मौज-ए-रंग-ओ-नूरहैलम्होंकीफ़ालपर
बहतेहुजूमशामकेलम्होंकासैलहम
रक़्साँहैंज़ेहनझूमतेक़दमोंकेतालपर
उलझेहुएहैंबहसमेंवारफ़्तगान-ए-शाम
हैगुफ़्तुगूअदबकेउरूज-ओ-ज़वालपर
तयराह-गुज़ार-ए-पाहैमौज़ू-ए-गुफ़्तुगू
व्हिस्कीकेधुँदलकेहैंजवाब-ओ-सवालपर
'ग़ालिब'काज़िक्रथाअभी'शेली'परगए
पहुँचे'मलार
में'सेजलाल-ओ-जमालपर
झोंकोंकेसाथसाथकोईताएर-ए-ख़याल
बैठताहैज़ेहनकीशादाबडालपर
गर्द-ए-सफ़रसेप्यारहैमंज़िलकाग़मनहीं
यूँँचलरहेहैंरहगुज़र-ए-माह-ओ-सालपर
छाएहुएहैंसोचकेसाएकहींकहीं
छिटकीहुईहैचाँदनीबाम-ए-ख़यालपर
हरसायाअपनीअपनीगुफामेंलुढ़कगया
हमलोगघूमतेरहेसुनसानमालपर
  - Rafiq Khawar Jaskani
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