aadam ki pahli awaaz | आदम की पहली आवाज़

  - Qamar Jameel
आदमकीपहलीआवाज़
इनपत्थरोंमेंअबभी
चमकरहीहैजिन्हेंपहली
बारमैंनेअपनीअपनीज़मीं
मैंदेखामेरीसर-ज़मीं
उनबर्फ़ाबजिस्मोंसेआबादहै
जिनजिस्मोंमेंख़ूब-सूरत
आँखेंनईजन्नतकीसफ़ीरहैंफ़ीडयास
मैंतुझे
एकनएइंसानकाचेहरा
दिखाताहूँउसचेहरेपर
इंसानियतकाग्रीसहैऔर
अज़्मत-ए-आदमकीवोतस्वीरहै
जोहमेशामेरीज़मीनपरचमकती
रहेगीमैंआदमको
फ़ितरतसेअज़ीमसमझताहूँ
मेरीरातोंमेंपत्थरचमकते
मैंऔरमेरेदिन
मरमरकीरातोंसेज़ियादारौशनहैं
येदेखयेआदमहैजिसपररौशनी
दाहिनेकंधेसेनीचेगिररहीहै
रौशन-दानकादरवाज़ाबंदकरो
अभीआदमकोअपनीहीज़मीनकेलिएइस
रौशनीकीज़रूरतहैऔरमेरीज़मीन
परअबभीवोसायामौजूदहैजिस
साएमेंअन-गिनतरातेंअन-गिनत
रंगऔरअन-गिनतचेहरेमौजूदहैं
इनअँधेरेमेंरफ़ाईलहीनहीं
रोडनऔरहेनरीमोरभीघूमरहेहैं
अपनेअपनेमुजस्समोंकेसाथमगरमें
अबएकनएआदमकामुजस्समाबनाऊँगा
जिसआदमकेचेहरेपरअपनीज़मींकीमिट्टीके
साथअपनीज़मीनकासूरजभीचमकेगा
काशमैंइसनएसूरजका
मुजस्समाबनासकूँ
  - Qamar Jameel
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