andhere dhoondhne nikle khandar kyun | अंधेरे ढूँडने निकले खंडर क्यूँँ

  - P P Srivastava Rind
अंधेरेढूँडनेनिकलेखंडरक्यूँँ
ख़ुदाजानेहुएयेदर-ब-दरक्यूँँ
येबूउजड़ेहुएबाज़ारकीहै
मिरीबस्तीहुईना-मो'तबरक्यूँँ
समाअतमुंजमिदसीहोरहीहै
मगरशोला-बयानीपरअसरक्यूँँ
अगरएहसासहीहैरत-ज़दाहै
तोकाँधेपरलिएफिरतेहोसरक्यूँँ
येबोझलशामकाधुँदलातसव्वुर
मिरेएहसासपरछायामगरक्यूँँ
मिज़ाज-ए-शहरमेंतब्दीलियांहैं
मिरेतेवरबदलतेदेखकरक्यूँँ
जहाँपत्थरतराशेजारहेहों
वहाँख़ेमालगाएँशीशागरक्यूँँ
ख़लासेदेखनाहै'रिंद'दुनिया
तोफिरठहरूँपुरानेचाँदपरक्यूँँ
  - P P Srivastava Rind
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