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Murli Dhakad
kidhar ja raha hai jugnoo shaam uthaaye
kidhar ja raha hai jugnoo shaam uthaaye | किधर जा रहा है जुगनू शाम उठाए
- Murli Dhakad
किधर
जा
रहा
है
जुगनू
शाम
उठाए
इधर
बैठा
हूँ
मैं
जाम
उठाए
- Murli Dhakad
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प्रेम
की
गली
में
सब
शराब
लेकर
आए
थे
हम
बहुत
ख़राब
थे
किताब
लेकर
आए
थे
Aman Akshar
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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वो
गुल-फ़रोश
कहाँ
अब
गुलाब
किस
से
लूँ
नहीं
रहा
मिरा
साक़ी
शराब
किस
से
लूँ
Anwar Shaoor
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कुछ
भी
बचा
न
कहने
को
हर
बात
हो
गई
आओ
कहीं
शराब
पिएँ
रात
हो
गई
Nida Fazli
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गरेबाँ
चाक,
धुआँ,
जाम,
हाथ
में
सिगरेट
शब-ए-फ़िराक़,
अजब
हाल
में
पड़ा
हुआ
हूँ
Hashim Raza Jalalpuri
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बोसाँ
लबाँ
सीं
देने
कहा
कह
के
फिर
गया
प्याला
भरा
शराब
का
अफ़्सोस
गिर
गया
Abroo Shah Mubarak
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हक़ीक़तों
की
तल्ख़ियाँ
भी
मीठे
ख़्वाब
की
तरह
मुझे
शराब
दे
रही
है
वो
गुलाब
की
तरह
Rachit Sonkar
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दुनिया
को
मारा
जिगर
के
शे'रों
ने
जिगर
को
शराब
ने
मारा
Jigar Moradabadi
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मुझे
शराब
पिलाई
गई
है
आँखों
से
मेरा
नशा
तो
हज़ारों
बरस
में
उतरेगा
Vijendra Singh Parwaaz
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मुझे
ये
फ़िक्र
सब
की
प्यास
अपनी
प्यास
है
साक़ी
तुझे
ये
ज़िद
कि
ख़ाली
है
मिरा
पैमाना
बरसों
से
Majrooh Sultanpuri
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फरिश्ते
फुर्सत
में
बैठकर
लिखते
हैं
किसी
का
ख़राब
होना
हर
अंगूर
की
किस्मत
में
नहीं
होता
है
शराब
होना
Murli Dhakad
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हम
सेे
क्या
मान
सम्मान
की
बातें
'रिंद'
हमने
शराब
के
लिए
किताबें
बेची
है
Murli Dhakad
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और
कोई
ग़म
न
था
क्या
जमाने
में
दिल
दहल
उठा
है
आधे
ही
पैमाने
में
कोई
जन्नत
का
नाम
न
ले
लेना
ख़ुदा
के
साथ
खड़ा
हूँ
वीराने
में
और
भी
हैं
साक़ी
के
तलबगार
और
भी
लोग
हैं
मय-ख़ाने
में
तुम
मुझ
सेे
मेरा
हासिल
पुछते
हो
उम्र
गुज़री
है
तुमको
रिझाने
में
तुम
सीरत
में
मुझ
सेे
जुदा
हो
लेकिन
है
तुम्हारा
दर्द
भी
मेरे
अफ़साने
में
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Murli Dhakad
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दिल
दुखाने
को
आए
हो
तुम
फिर
रुलाने
को
आए
हो
तुम
क्या
नए
किस्म
का
कुछ
सितम
आज़माने
को
आए
हो
तुम
चिट्ठियाँ
लाए
हो
या
परन्द
आबोदाने
को
आए
हो
तुम
पास
आओगे
या
दूरियां
और
बढ़ाने
को
आए
हो
तुम
जलने
दो
मेरे
दिल
का
चराग़
क्यूँ
बुझाने
को
आए
हो
तुम
दिल
में
है
एक
अजब
सी
लहर
कि
बुलाने
को
आए
हो
तुम
हम
जैसे
फ़क़ीरों
के
पास
क्या
चुराने
को
आए
हो
तुम
ये
न
कहना
कि
इस
बार
तो
कुछ
गंवाने
को
आए
हो
तुम
मान
लूँ
मैं
कि
मजबूर
हो
तुम
क्या
हंसाने
को
आए
हो
तुम
रेत
पर
जो
लिखा
ही
नहीं
वो
मिटाने
को
आए
हो
तुम
तुमको
है
कुछ
ख़बर
कुछ
हिसाब
एक
जमाने
को
आए
हो
तुम
मुझको
शक
है
बहारों
का
गीत
गुनगुनाने
को
आए
हो
तुम
महके
महके
इशारों
से
क्या
घर
गिराने
को
आए
हो
तुम
अब
समुंदर
में
घर
है
मेरा
क्या
डूबाने
को
आए
हो
तुम
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Murli Dhakad
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ख़ाक
हुआ
तो
वजूद
फिर
से
मिट्टी
के
साथ
बाँधा
गया
मैं
वो
बदनसीब
पत्थर
था
जो
चिट्ठी
के
साथ
बाँधा
गया
Murli Dhakad
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