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Murli Dhakad
khaak hua to vujood phir se miTTi ke saath baandha gaya
khaak hua to vujood phir se miTTi ke saath baandha gaya | ख़ाक हुआ तो वजूद फिर से मिट्टी के साथ बाँधा गया
- Murli Dhakad
ख़ाक
हुआ
तो
वजूद
फिर
से
मिट्टी
के
साथ
बाँधा
गया
मैं
वो
बदनसीब
पत्थर
था
जो
चिट्ठी
के
साथ
बाँधा
गया
- Murli Dhakad
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'आशिक़
का
ख़त
है
पढ़ना
ज़रा
देख-भाल
के
काग़ज़
पे
रख
दिया
है
कलेजा
निकाल
के
LALA RAKHA RAM BARQ
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'ताहिर'
उन
बे-बस
लम्हों
का
अहद
निभाना
होगा
उस
ने
कहा
था
ख़त
मत
लिखना
ग़ज़लें
लिखते
रहना
Qayyum Tahir
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तेरे
वादों
को
फिर
से
पढ़
रहा
हूँ
तेरे
ख़त
पानी
पानी
हो
रहे
हैं
Harman Dinesh
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तुम्हारे
ख़त
में
नया
इक
सलाम
किसका
था
न
था
रक़ीब
तो
आख़िर
वो
नाम
किसका
था
Dagh Dehlvi
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मुहब्बत
उठ
गई
दोनों
घरों
से
सुना
है
एक
ख़त
पकड़ा
गया
है
Anjum Ludhianvi
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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तुम्हारा
दिल
है
बड़ा
सा
दरबा
जहाँँ
कबूतर
फड़क
रहे
हैं
कहाँँ
है
खोई
हमारी
चिट्ठी
कहाँँ
कबूतर
भटक
रहा
है
Anmol Mishra
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मेरे
महबूब
मत
बेचैन
होना
तेरे
क़ासिद
ने
ख़त
पहुँचा
दिया
है
Shajar Abbas
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आज
बादल
के
सहारे
उसने
ख़त
भेजा
हमें
आसमाँ
क़ासिद
है
कैसा
लफ़्ज़
बरसाता
नहीं
Shan Sharma
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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मुजाहिद
की
दास्तान
है
ख़्वाब
मेरे
उम्र
भर
की
थकान
है
ख़्वाब
मेरे
परिंदे
तो
सभी
है
पिंजरों
में
क़ैद
पतंगों
का
आसमान
है
ख़्वाब
मेरे
जहाँ
सभी
मुसाफिर
थक
हार
के
पहुंचे
जन्नतों
का
शमशान
है
ख़्वाब
मेरे
मैं
इस
मकाँ
से
उस
मकाँ
में
दर-ब-दर
दीवारों
के
दरमियान
है
ख़्वाब
मेरे
रात
भी
बदल
के
सुब्ह
हो
गई
अब
तलक
वीरान
है
ख़्वाब
मेरे
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Murli Dhakad
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जाम
कहने
सुनने
को
कहानी
रह
गया
है
और
पीने
को
बस
पानी
रह
गया
है
Murli Dhakad
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परिंदे
की
परवाज
सुनाई
दी
है
गगन
में
कोई
आवाज
सुनाई
दी
है
ये
कांसा
टूटा
या
दिल
था
किसी
का
सिक्कों
के
बिखरने
की
आवाज
सुनाई
दी
है
मैं
सोचता
था
दिल
धड़कता
तो
होगा
मुद्दतों
बाद
आज
आवाज
सुनाई
दी
है
मैं
जब
भी
किसी
अनजान
शहरस
गुजरा
मुझे
एक
जानी
पहचानी
आवाज
सुनाई
दी
है
याद
तुम्हारी
बारहा
तो
नहीं
आई
मगर
मुझे
अक्सर
तुम्हारी
आवाज
सुनाई
दी
है
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Murli Dhakad
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इसी
उलझन
में
उम्र
सारी
बसर
की
ये
छाया
सूरज
की
है
या
शजर
की
एक
दिन
मैं
अपने
घर
महमान
हुआ
ताक
पर
रख
दी
आवारगी
ज़िन्दगी
भर
की
मैंने
हादसों
से
अपनी
झोली
भर
ली
जैसे
कमाई
हो
किसी
लंबे
सफ़र
की
कोई
इतना
मुतमईन
कैसे
हो
सकता
है
जाम
भी
ना
लिया
ज़िन्दगी
भी
बसर
की
दिन
तो
कयामत
था
गुज़ारा
नहीं
गया
रात
तो
ज़िन्दगी
थी
सो
बसर
की
हाँ
फसाना
तो
मैं
भूल
गया
लेकिन
कुछ
गलियां
याद
है
तेरे
शहर
की
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Murli Dhakad
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ये
कैसा
तजुर्बा
है
कि
दिल
जलाने
पे
अक्सर
अँधेरा
छा
जाता
है
रोशनी
नहीं
होती
Murli Dhakad
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