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Murari Mandal
kisi aahat se dahla hai mira man
kisi aahat se dahla hai mira man | किसी आहट से दहला है मिरा मन
- Murari Mandal
किसी
आहट
से
दहला
है
मिरा
मन
कि
बस
इतना
ही
छोटा
है
मिरा
मन
मेरे
हुजरे
में
तन्हाई
पड़ी
है
मेरी
चौखट
पे
सोता
है
मिरा
मन
ग़लत
हो
बात
फिर
भी
मानता
है
कोई
ऐसे
भी
रखता
है
मिरा
मन
ख़ुशी
मिलती
थी
जिस
सेे
मिल
के
कल
तक
उसे
अब
मिल
के
रोता
है
मिरा
मन
- Murari Mandal
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ख़ुद
चले
आओ
या
बुला
भेजो
रात
अकेले
बसर
नहीं
होती
Aziz Lakhnavi
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दबी
कुचली
हुई
सब
ख़्वाहिशों
के
सर
निकल
आए
ज़रा
पैसा
हुआ
तो
च्यूँँटियों
के
पर
निकल
आए
अभी
उड़ते
नहीं
तो
फ़ाख़्ता
के
साथ
हैं
बच्चे
अकेला
छोड़
देंगे
माँ
को
जिस
दिन
पर
निकल
आए
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Mehshar Afridi
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नाप
रहा
था
एक
उदासी
की
गहराई
हाथ
पकड़कर
वापस
लायी
है
तन्हाई
वस्ल
दिनों
को
काफ़ी
छोटा
कर
देता
है
हिज्र
बढ़ा
देता
है
रातों
की
लम्बाई
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Tanoj Dadhich
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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देखो
ऐसे
क़रीब
आने
की
आस
मत
लगाओ
तुम
तन्हाई
से
रब्त
बढ़ाओ
फिर
मेरे
पास
आओ
तुम
Rohit tewatia 'Ishq'
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चालीस
साल
इस
को
अकेले
निभाएँगे
ये
चार
साल
का
जो
तअल्लुक़
था
दरमियाँ
Afzal Ali Afzal
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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तुम
मिरे
साथ
हो
ये
सच
तो
नहीं
है
लेकिन
मैं
अगर
झूट
न
बोलूँ
तो
अकेला
हो
जाऊँ
Ahmad Kamal Parvazi
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मैं
अकेला
ही
चला
था
जानिब-ए-मंज़िल
मगर
लोग
साथ
आते
गए
और
कारवाँ
बनता
गया
Majrooh Sultanpuri
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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अब
किसी
का
भी
तो
मैं
अपना
नहीं
हूँ
कौन
कहता
है
कि
मैं
बदला
नहीं
हूँ
बात
होती
है
मेरी
दीवार
से
अब
लोग
कहते
हैं
कि
मैं
तन्हा
नहीं
हूँ
एक
ये
सच
बस
जिसे
मैं
जानता
हूँ
साँस
चलती
है
मगर
ज़िंदा
नहीं
हूँ
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Murari Mandal
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कोई
इक
शे'र
सुनके
रो
पड़ा
है
किसी
को
फ़र्क
नइ
पड़ता
ग़ज़ल
से
Murari Mandal
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नया
घर
औ
नया
जीवन
मुबारक
सनम
तुमको
नया
साजन
मुबारक
सजा
है
चाँद
सा
मुखड़ा
तुम्हारा
लगी
है
हाथ
जो
उबटन
मुबारक
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Murari Mandal
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कुछ
न
बिगड़ा
है
ख़ुश
बहुत
हूॅं
मैं
वक़्त
जैसा
है
ख़ुश
बहुत
हूँ
मैं
मुझको
कोई
नहीं
समझ
पाया
सबको
लगता
है
ख़ुश
बहुत
हूॅं
मैं
यूँँॅं
नज़र
भर
के
मेरी
आँखों
को
देखता
क्या
है
ख़ुश
बहुत
हूॅं
मैं
जिसने
छोड़ा
था
मार
कर
मुझको
वो
भी
तन्हा
है
ख़ुश
बहुत
हूॅं
मैं
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Murari Mandal
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युद्धों
के
परिणाम
अवध
में
लौटे
हैं
जबसे
अपने
राम
अवध
में
लौटे
हैं
ऐसी
ज्योति
जगी
है
घर
में
दीपों
से
जैसे
चारों
धाम
अवध
में
लौटे
हैं
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Murari Mandal
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