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Murari Mandal
koi ik she'r sunke ro pada hai
koi ik she'r sunke ro pada hai | कोई इक शे'र सुनके रो पड़ा है
- Murari Mandal
कोई
इक
शे'र
सुनके
रो
पड़ा
है
किसी
को
फ़र्क
नइ
पड़ता
ग़ज़ल
से
- Murari Mandal
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नशा
मय
का
बहुत
छोटा
लगा
है
कि
जबसे
हुस्न
का
चस्का
लगा
है
अधर
को
फ्रूट
के
जैसे
चखूँगा
इक
अरसे
बाद
ये
मौक़ा
लगा
है
ख़फ़ा
क्यूँ
है
हमीं
से
शाहज़ादी
बुरा
किस
बात
का
इतना
लगा
है
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जिसने
छीना
मिरा
ठिकाना
है
उसके
दिल
में
ही
घर
बनाना
है
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फिर
तो
किस
चीज़
की
कमी
होगी
संग
मेरे
जो
शा'इरी
होगी
होश
सब
के
उड़े
हुए
हैं
तो
वो
इधर
से
गुज़र
गई
होगी
श्वेत
चादर
बिछा
है
मुझ
पे
और
लाल
जोड़े
में
वो
सजी
होगी
दिल
दहलने
लगा
है
मेरा
फिर
वो
किसी
और
से
मिली
होगी
बज़्म-ए-शोरा
भी
आख़िरी
है
ये
और
ग़ज़ल
भी
ये
आख़िरी
होगी
यार
'माधव'
कभी
ये
सोचा
था
ज़िंदा
रहना
भी
बुझदिली
होगी
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अब
किसी
का
भी
तो
मैं
अपना
नहीं
हूँ
कौन
कहता
है
कि
मैं
बदला
नहीं
हूँ
बात
होती
है
मेरी
दीवार
से
अब
लोग
कहते
हैं
कि
मैं
तन्हा
नहीं
हूँ
एक
ये
सच
बस
जिसे
मैं
जानता
हूँ
साँस
चलती
है
मगर
ज़िंदा
नहीं
हूँ
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पागल
हर
इक
शख़्स
यहाँ
हो
जाता
है
जो
भी
उसके
पहलू
में
सो
जाता
है
काम
नहीं
होता
अपना
दरख़्वास्त
पे
भी
तुम
बस
नेत्र
घुमाओ
तो
हो
जाता
है
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