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Rohit tewatia 'Ishq'
dekho aise qareeb aane ki aas mat lagao tum
dekho aise qareeb aane ki aas mat lagao tum | देखो ऐसे क़रीब आने की आस मत लगाओ तुम
- Rohit tewatia 'Ishq'
देखो
ऐसे
क़रीब
आने
की
आस
मत
लगाओ
तुम
तन्हाई
से
रब्त
बढ़ाओ
फिर
मेरे
पास
आओ
तुम
- Rohit tewatia 'Ishq'
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मैं
अपने
चारों
तरफ़
हूँ
और
इस
तरह
का
हुजूम
अजीब
किस्म
की
तन्हाई
साथ
लाता
है
Abhishek shukla
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पता
करो
कि
मेरे
साथ
कौन
उतरा
था
ज़मीं
पे
कोई
अकेला
नहीं
उतरता
है
Ahmad Abdullah
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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ऐसा
लगता
है
कि
तन्हाई
मुझे
छूती
है
उँगलियाँ
कौन
फिरोता
है
मेरे
बालों
में
Ashok Mizaj Badr
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तन्हाई
ये
तंज
करे
है
तन्हा
क्यूँ
है
यार
कहाँ
है
आगे
पीछे
चलने
वाले
Vishal Singh Tabish
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अकेले
में
भी
खुलकर
हँस
रहा
हूँ
उसे
ये
सुनके
रोना
आ
रहा
है
Dev Niranjan
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मैं
कुछ
दिन
से
अचानक
फिर
अकेला
पड़
गया
हूँ
नए
मौसम
में
इक
वहशत
पुरानी
काटती
है
Liaqat Jafri
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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मैं
अकेला
ही
चला
था
जानिब-ए-मंज़िल
मगर
लोग
साथ
आते
गए
और
कारवाँ
बनता
गया
Majrooh Sultanpuri
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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मेरी
चाहत
का
ये
अंजाम
नहीं
हो
सकता
मैं
तेरे
शहर
में
गुमनाम
नहीं
हो
सकता
Rohit tewatia 'Ishq'
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उसको
सौ
सौ
बार
पुकारा
फिर
चौखट
में
सर
दे
मारा
रो
रो
कर
बोला
था
मैंने
रुक
जाओ
ना
यार
ख़ुदारा
वो
थी
मुझको
चाँद
सी
पूरी
मैं
था
उसका
टूटा
तारा
जाल
उसी
के
पास
था
बेशक
मछली
थी
वो
मैं
मछुआरा
वो
कहती
थी
किसका
बच्चा
मैं
कहता
था
जान
तुम्हारा
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Rohit tewatia 'Ishq'
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अपने
ग़म
को
मैं
यूँँ
बढ़ाता
हूँ
उस
सेे
मिलने
ख़ुशी
से
जाता
हूँ
एक
दीवार
गिरती
जाती
है
एक
तस्वीर
जो
हटाता
हूँ
ये
भी
कुछ
कम
नहीं
कि
सबको
मैं
काम
पड़ने
पे
याद
आता
हूँ
कोई
देखे
उदास
हूँ
कितना
जब
उदासी
में
मुस्कुराता
हूँ
चुप
सा
रहने
लगा
हूँ
लोगों
में
शोर
तन्हाई
में
मचाता
हूँ
मिलना
मुमकिन
नहीं
हक़ीक़त
में
सो
उसे
ख़्वाब
में
बुलाता
हूँ
यूँँ
तो
डरता
नहीं
ज़माने
से
वो
जो
देखे
तो
काँप
जाता
हूँ
मुझको
वो
भी
डुबा
के
जाते
हैं
मैं
जिन्हें
तैरना
सिखाता
हूँ
सर
पे
चढ़ती
है
जब
मेरे
दुनिया
माँ
के
क़दमों
में
बैठ
जाता
हूँ
मैंने
क्या
शौक़
पाल
रक्खे
हैं
इश्क़
करता
हूँ
दिल
जलाता
हूँ
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Rohit tewatia 'Ishq'
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चाहता
हूँ
कि
पहले
ख़ता
कुछ
करूँँ
फिर
ख़ता
के
मुनासिब
सज़ा
चाहिए
Rohit tewatia 'Ishq'
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तेरा
सवाल
भी
है
हूबहू
तेरे
जैसा
तेरे
सवाल
का
भी
जान-ए-जाँ
जवाब
नहीं
Rohit tewatia 'Ishq'
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