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Ankur Mishra
ab kisi se kya bataayen
ab kisi se kya bataayen | अब किसी से क्या बताएँ
- Ankur Mishra
अब
किसी
से
क्या
बताएँ
और
कितना
हम
छुपाएँ
दर्द
बढ़ता
जा
रहा
है
कैसे
हम
मरहम
लगाएँ
हमने
ही
तोड़े
थे
रिश्ते
हम
ही
अब
फिर
आज़माएँ
इतने
तो
पागल
नहीं
हम
उस
से
जो
फिर
रूठ
जाएँ
है
वो
क़ातिल
मेरा
लेकिन
उस
को
अब
कैसे
भुलाएँ
हो
गया
वो
ग़ैर
तो
क्या
नाम
क्यूँँ
उसका
बताएँ
- Ankur Mishra
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अपना
रिश्ता
ज़मीं
से
ही
रक्खो
कुछ
नहीं
आसमान
में
रक्खा
Jaun Elia
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तुम्हारा
तो
ख़ुदास
राबता
है
तो
देखो
ना,
हमारे
दुख
बता
कर
Siddharth Saaz
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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जिस
लब
के
ग़ैर
बोसे
लें
उस
लब
से
'शेफ़्ता'
कम्बख़्त
गालियाँ
भी
नहीं
मेरे
वास्ते
Mustafa Khan Shefta
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प्यार
का
रिश्ता
ऐसा
रिश्ता
शबनम
भी
चिंगारी
भी
यानी
उन
सेे
रोज़
ही
झगड़ा
और
उन्हीं
से
यारी
भी
Ateeq Allahabadi
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उसने
हँसते
हुए
तोड़ा
था
हमारा
रिश्ता
हम
सभी
को
ये
बताते
हुए
रो
देते
हैं
Zubair Alam
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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कौन
सी
दीवार
है
मौजूद
इस
रिश्ते
में
'साज़'
क्यूँँ
नहीं
रो
सकते
हम
अपने
पिता
के
सामने
Siddharth Saaz
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उनको
बचाये
रक्खो
मैं
चाहता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाये
रक्खो
Azm Shakri
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किस
तरह
ख़ुद
से
वफ़ा
करते
हम
अगर
तुझ
सेे
दग़ा
करते
सम्त
तेरी
हैं
निगाहें
सब
किस
तरफ़
ये
आइना
करते
रूठ
जाती
ये
फ़ज़ा
हम
सेे
जो
परिंदों
से
गिला
करते
है
तक़ाज़ा
उम्र
का
वर्ना
इश्क़
तो
बे-इंतिहा
करते
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Ankur Mishra
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किसलिए
इतनी
उदासी
है
ख़ुश
हूँ
हँसना
ही
तो
बाक़ी
है
कौन
करता
है
वफ़ा
किस
सेे
किसलिए
ये
याद
आती
है
जिस्म
से
है
राब्ता
सबका
रूह
ये
प्यासी
की
प्यासी
है
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Ankur Mishra
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रस्म
हर
वो
निभाई
गई
है
जो
भी
जब
भी
बताई
गई
है
आज
भी
मैं
नहीं
भूला
कुछ
भी
आज
फिर
मय
छुपाई
गई
है
किस
सेे
पूछूँ
मैं
अपना
पता
अब
याद
उसकी
दिलाई
गई
है
पास
कुछ
भी
नहीं
मेरे
बस
ये
बात
यूँँ
ही
उड़ाई
गई
है
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Ankur Mishra
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कोई
रहता
नहीं
फिर
भी
भरा
सा
ही
है
लगता
सच
तेरी
यादों
से
घर
अब
भी
हरा
सा
ही
है
लगता
सच
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Ankur Mishra
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छाँव
सहरा
की
शजर
को
ढूँढती
है
धूप
घर
को
किस
तरह
करता
जुदा
मैं
आइने
से
उस
नज़र
को
चूम
लेती
हैं
निगाहें
जब
निगाहों
से
नज़र
को
अब
तलक
भूले
नहीं
हैं
ये
क़दम
उस
रह-गुज़र
को
रात
रखती
है
जगाए
ऐ
मुसाफ़िर
इस
सहर
को
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Ankur Mishra
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