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Ankur Mishra
kis tarah KHud se vafaa karte
kis tarah KHud se vafaa karte | किस तरह ख़ुद से वफ़ा करते
- Ankur Mishra
किस
तरह
ख़ुद
से
वफ़ा
करते
हम
अगर
तुझ
सेे
दग़ा
करते
सम्त
तेरी
हैं
निगाहें
सब
किस
तरफ़
ये
आइना
करते
रूठ
जाती
ये
फ़ज़ा
हम
सेे
जो
परिंदों
से
गिला
करते
है
तक़ाज़ा
उम्र
का
वर्ना
इश्क़
तो
बे-इंतिहा
करते
- Ankur Mishra
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एक
ही
ज़ख़्म
हर
शाख़
में
है
आग
कितनी
मिरी
ताख़
में
है
बंद
रखता
हूँ
खिड़की
मैं
लेकिन
मसअला
कोई
सूराख़
में
है
ज़िंदगी
को
तलब
मौत
की
थी
वर्ना
जुर्रत
भी
गुस्ताख़
में
है
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इस
क़दर
भी
आज़माया
है
नाम
से
उसके
बुलाया
है
छोड़
दूँ
कैसे
वो
रस्ता
मैं
घर
ये
मुश्किल
से
बनाया
है
आज
भी
हूँ
याद
मैं
उसको
डाकिया
ख़त
जिसका
लाया
है
अब
करें
क्या
शिकवा
हम
उस
सेे
कौन
सा
हमने
निभाया
है
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दिल
जलाकर
रौशनी
की
है
नाम
उसके
ज़िंदगी
की
है
भूलूँ
कैसे
उसको
मैं
यूँँ
हीं
जिसकी
मैंने
बंदगी
की
है
छोड़
दो
तन्हा
ही
मुझको
तुम
दिल
ने
ख़्वाहिश
आख़िरी
की
है
मुद्दतों
देखा
नहीं
ख़ुद
को
इतनी
मैंने
आशिक़ी
की
है
कैसे
जाऊँ
दूर
उस
सेे
मैं
जिसकी
ख़ातिर
ख़ुद-कुशी
की
है
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बंद
आँखों
से
दीदार
हो
चेहरा
ऐसा
कोई
यार
हो
छोड़
दूँ
जीना
जिसके
लिए
साथ
मरने
को
तैयार
हो
ख़्वाब
आए
उसे
मेरे
बस
इतना
तो
उसको
भी
प्यार
हो
सोचूँ
जब
भी
उसे
मैं
कभी
सामने
ही
वो
सरकार
हो
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Ankur Mishra
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फिर
उसी
की
प्यास
में
थे
ज़िंदगी
की
आस
में
थे
हम
कभी
ऐ
हम-नशीं
उस
हम-नवा
के
ख़ास
में
थे
फ़ासलों
से
राब्तों
तक
दर्द
ही
अहसास
में
थे
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