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Ankur Mishra
koii rehta nahin phir bhi
koii rehta nahin phir bhi | कोई रहता नहीं फिर भी
- Ankur Mishra
कोई
रहता
नहीं
फिर
भी
भरा
सा
ही
है
लगता
सच
तेरी
यादों
से
घर
अब
भी
हरा
सा
ही
है
लगता
सच
- Ankur Mishra
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किसी
उम्मीद
का
ये
इस्तिआरा
जान
पड़ता
है
कि
तन्हा
ही
सही
सच
झूट
से
अब
रोज़
लड़ता
है
Tarun Pandey
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झूट
वाले
कहीं
से
कहीं
बढ़
गए
और
मैं
था
कि
सच
बोलता
रह
गया
Waseem Barelvi
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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होंठ
जो
कहते
है
सब
कुछ
झूठ
है
आँख
सच
कहती
है
उसकी
बात
सुन
Siddharth Saaz
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हमारी
ज़िंदगी
में
क्या
नया
है
वही
होता
है
जो,
वो
हो
रहा
है
ज़रा
दुनिया
का
अपनी
हाल
देखो
ज़रा
सोचो
कोई
सच-मुच
ख़ुदा
है?
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Shaad Imran
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ज़माने
ने
ग़लत
को
सच
कहा
है
ज़माने
की
ख़राबी
है
हमीं
से
Meem Alif Shaz
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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जज़्बातों
को
सहज
लफ्ज़ों
में
पिरोता
हूँ
मैं
लिखता
फ़क़त
वही
हूँ
जो
सच
में
होता
हूँ
मैं
Harsh saxena
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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इतने
अफ़सुर्दा
नहीं
हैं
हम
कि
कर
लें
ख़ुद-कुशी
और
न
इतने
ख़ुश
कि
सच
में
मरने
की
ख़्वाहिश
न
हो
Charagh Sharma
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ज़ख़्म
से
गहरी
अगर
तासीर
हो
क्या
करें
जब
बे-वफ़ा
ही
हीर
हो
उस
बदन
से
राब्ता
कर
लूँ
अगर
पीर
उसकी
हमनशीं
बे-पीर
हो
रक़्स
करती
ये
जवानी
देखकर
किस
तरह
ख़्वाहिश
कोई
ता'बीर
हो
सोचता
हूँ
इन
लकीरों
में
भी
इक
यार
'अंकुर'
वो
ख़त-ए-तक़्दीर
हो
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Ankur Mishra
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शाम
ढ़लती
नहीं
रात
कटती
नहीं
तिश्नगी
ज़िंदगी
की
वो
छटती
नहीं
जानता
हूँ
नहीं
आनी
वो
राह
पर
ज़ेहन
से
क्यूँ
वो
सूरत
भी
हटती
नहीं
है
ख़बर
हो
गया
है
वो
दुश्मन
मगर
शब
बिना
उसके
ये
अब
तो
कटती
नहीं
जाने
किसने
चुराए
हैं
सपने
मेरे
क्यूँ
ये
पलकें
भी
आँखों
से
हटती
नहीं
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Ankur Mishra
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पास
तेरे
जो
अमानत
है
सीने
में
अब
भी
सलामत
है
पड़
चुकी
है
लाश
ठंडी
पर
ले
रहा
हूँ
साँस
हैरत
है
ये
बदन
मंज़िल
नहीं
मेरी
क्या
हुआ
वो
ख़ूब-सूरत
है
और
भी
हैं
रास्ते
जानाॅं
आख़िरी
कोई
मोहब्बत
है
ढूॅंढ
लूँगा
इन
लकीरों
में
जो
लिखी
उसने
इबारत
है
हो
न
जाए
देखना
अंकुर
फिर
मोहब्बत
तुझको
आदत
है
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Ankur Mishra
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फिर
मोहब्बत
की
वही
चाहत
करें
इश्क़
से
अच्छा
कहीं
हिजरत
करें
हम-सफ़र
है
इस
सफ़र
में
तू
मगर
कब
तलक़
ऐ
ज़िंदगी
अज़मत
करें
कर
न
पाया
जो
मोहब्बत
ही
कभी
किस
तरह
उस
सेे
सनम
नफ़रत
करें
चाहते
हैं
जिस
शजर
की
छाॅंव
हम
उस
शजर
की
क्यूँ
न
हम
उजरत
करें
जिन
चराग़ों
से
है
रौशन
ये
सहर
उन
चराग़ों
की
बशर
ख़िदमत
करें
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Ankur Mishra
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छुप
कर
नज़ारा
करते
हैं
उस
को
पुकारा
करते
हैं
आए
न
आए
वो
मगर
हम
तो
इशारा
करते
हैं
वाक़िफ़
हूँ
मैं
हर
मर्म
से
उल्फ़त
दुबारा
करते
हैं
वो
आज़माए
तो
सही
हम
भी
ख़सारा
करते
हैं
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Ankur Mishra
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