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Ankur Mishra
chhup kar nazaara karte hainus ko pukaara karte hain
chhup kar nazaara karte hainus ko pukaara karte hain | छुप कर नज़ारा करते हैं
- Ankur Mishra
छुप
कर
नज़ारा
करते
हैं
उस
को
पुकारा
करते
हैं
आए
न
आए
वो
मगर
हम
तो
इशारा
करते
हैं
वाक़िफ़
हूँ
मैं
हर
मर्म
से
उल्फ़त
दुबारा
करते
हैं
वो
आज़माए
तो
सही
हम
भी
ख़सारा
करते
हैं
- Ankur Mishra
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सच
बताओ
कि
सच
यही
है
क्या
साँस
लेना
ही
ज़िंदगी
है
क्या
कुछ
नया
काम
कर
नई
लड़की
इश्क़
करना
है
बावली
है
क्या
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Vikram Gaur Vairagi
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तुम
मिरी
ज़िंदगी
हो
ये
सच
है
ज़िंदगी
का
मगर
भरोसा
क्या
Bashir Badr
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मेरे
सीने
में
नहीं
तो
तेरे
सीने
में
सही
हो
कहीं
भी
आग
लेकिन
आग
जलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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लहजा
ही
थोड़ा
तल्ख़
है
दुनिया
के
सामने
वैसे
तो
ठीक
ठाक
हूँ
मैं
बोल-चाल
में
Ankit Maurya
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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मैं
आज
जो
भी
कहूँगा
तुम
सेे
वो
सच
है
जानम
ये
जान
लो
तुम
मिरी
ग़ज़ल
के
हरेक
मिसरे
से
मेरी
चाहत
झलक
रही
है
Amaan Pathan
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परवरदिगार
आपके
सब
फैसले
अजीब
हैं
जो
तंग
था
वो
तंग
है
जो
ठीक
था
वो
मर
गया
Adnan Raza
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कैसे
दिल
का
हाल
सही
हो
सकता
है
जब-तब
यूँँ
तुम
साड़ी
में
दिख
जाओगी
Tanha
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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बोसा
जो
रुख़
का
देते
नहीं
लब
का
दीजिए
ये
है
मसल
कि
फूल
नहीं
पंखुड़ी
सही
Sheikh Ibrahim Zauq
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इसलिए
इतना
अँधेरा
है
मियाॅं
हर
तरफ़
ख़्वाबों
का
घेरा
है
मियाॅं
किस
तरह
ख़ुद
से
बढ़ाऊॅं
राब्ता
शब
के
पहलू
में
सवेरा
है
मियाॅं
एक
मुद्दत
से
हैं
नम
ऑंखें
मिरी
एक
मुद्दत
से
वो
मेरा
है
मियाॅं
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Ankur Mishra
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ख़ामोश
लफ़्ज़ों
को
इशारा
चाहिए
दरिया
को
सहरा
का
सहारा
चाहिए
यूँँ
कब
तलक
बैठे
रहेंगे
बेसबब
हम
साहिलों
को
भी
किनारा
चाहिए
उल्फ़त
वफ़ा
सब
है
मिरे
पहलू
में
बस
मुझको
इशारा
इक
तुम्हारा
चाहिए
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Ankur Mishra
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वस्ल
में
हिज्र
की
बात
हो
ऐसी
फिर
क्यूँ
मुलाक़ात
हो
नींद
आना
भी
लाज़िम
है
पर
बाहों
में
उसकी
इक
रात
हो
छोड़
दूँगा
मैं
ये
शहर
भी
पहले
फिर
वो
ही
बरसात
हो
माना
क़ाबिल
नहीं
उसके
मैं
पर
मोहब्बत
की
क्या
ज़ात
हो
उसके
बिन
भी
मैं
जी
लेता
पर
ख़त्म
कैसे
ये
जज़्बात
हो
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Ankur Mishra
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हद
से
हम
अब
गुजर
थोड़ी
जाते
मियाँ
जो
कहा
हम
वो
कर
थोड़ी
जाते
मियाँ
है
मोहब्बत
बहुत
माना
तुझ
सेे
मगर
तेरे
बिन
हम
भी
मर
थोड़ी
जाते
मियाँ
ये
जो
रखते
हो
ख़ंजर
निगाहों
में
तुम
इनसे
हम
कोई
डर
थोड़ी
जाते
मियाँ
पहले
रिश्ते
रक़ीबों
से
तो
तोड़ते
लौट
फिर
हम
भी
घर
थोड़ी
जाते
मियाँ
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Ankur Mishra
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हर-सू
वो
चेहरा
नज़र
आए
देख
जिसको
आँख
भर
आए
तंग
है
माना
गली
लेकिन
घर
मिरे
भी
तो
सहर
आए
ख़ैरियत
मत
पूछो
मेरी
पर
उसकी
तो
कोई
ख़बर
आए
थक
गई
हैं
आँखें
मेरी
अब
वो
ज़मीं
अब
तो
नज़र
आए
रख
सकूँ
काँधे
पे
सर
जिसके
लौट
अब
तो
वो
बशर
आए
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Ankur Mishra
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