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Ankur Mishra
Zakhm se gahari agar taseer ho
ज़ख़्म से गहरी अगर तासीर हो
- Ankur Mishra
ज़ख़्म
से
गहरी
अगर
तासीर
हो
क्या
करें
जब
बे-वफ़ा
ही
हीर
हो
उस
बदन
से
राब्ता
कर
लूँ
अगर
पीर
उसकी
हमनशीं
बे-पीर
हो
रक़्स
करती
ये
जवानी
देखकर
किस
तरह
ख़्वाहिश
कोई
ता'बीर
हो
सोचता
हूँ
इन
लकीरों
में
भी
इक
यार
'अंकुर'
वो
ख़त-ए-तक़्दीर
हो
- Ankur Mishra
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नज़रों
से
दिल
पे
वार
कर
है
इश्क़
तो
इज़हार
कर
कब
तक
बहेगा
आँख
से
दरिया
कभी
तो
पार
कर
आसाँ
नहीं
ये
आशिक़ी
कोई
नया
व्यापार
कर
बस
जीतने
वाला
था
मैं
कहते
हैं
सब
ये
हार
कर
सब
कुछ
गँवा
कर
आया
हूँ
ख़ातिर
तिरी
अब
प्यार
कर
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पाॅंव
उठते
नहीं
और
चल
पड़ते
हैं
हम
अकेले
ही
घर
से
निकल
पड़ते
हैं
साथ
बहते
हैं
अब
इन
हवाओं
के
हम
लोग
अपनी
ज़मीं
पे
फिसल
पड़ते
हैं
फिर
किया
ही
नहीं
इश्क़
हमनें
कभी
नाम
से
इश्क़
के
पर
मचल
पड़ते
हैं
राज़
रखते
हैं
सीने
में
सारे
मगर
रात
होते
ही
जुगनू
सा
जल
पड़ते
हैं
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पलकों
पे
जो
शबनम
लिए
फिरते
रहे
तेरा
ही
था
जो
ग़म
लिए
फिरते
रहे
नम
ख़्वाहिशों
की
इस
ज़मीं
पे
बेसबब
तर
ख़्वाब
हम-दम
हम
लिए
फिरते
रहे
वीरान
सी
आँखों
में
जान-ए-जाँ
कई
हम
मुख़्तसर
मौसम
लिए
फिरते
रहे
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Ankur Mishra
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बेसबब
तन्हा
दर-ओ-दीवार
से
रब्त
है
मुझको
मिरे
किरदार
से
ज़ख़्म
पे
रहने
दे
मरहम
हुस्न
का
दर्द
बढ़ता
है
तिरे
दीदार
से
किस
तरह
होगी
मोहब्बत
सर-ब-सर
जीत
जाएँगे
अगर
सब
हार
से
सोचता
हूँ
ख़ाक
जल
जल
के
कहीं
हो
न
जाए
यार
जुगनू
आर
से
ख़ौफ़
था
हमको
बशर
तन्हाई
का
दूर
थे
बस
इसलिए
हम
यार
से
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धूप
में
जलता
बस
इक
बदन
था
मिट
गया
जो
वो
मिट्टी
का
तन
था
याद
रखता
हूँ
बातें
मैं
सच
है
जिस्म
से
हारा
आवारा
मन
था
बाद
उसके
भी
सब
वैसा
ही
है
तन
से
लिपटा
मिरे
वो
कफ़न
था
छोड़
दूँ
कैसे
ख़ुद
को
अकेला
दूर
मुझ
सेे
मिरा
भी
सजन
था
ज़िंदगी
से
हूँ
हारा
मगर
इक
बहता
मैं
भी
कभी
तो
पवन
था
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