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Ankur Mishra
shaam dhalti nahin raat kattee nahin
shaam dhalti nahin raat kattee nahin | शाम ढ़लती नहीं रात कटती नहीं
- Ankur Mishra
शाम
ढ़लती
नहीं
रात
कटती
नहीं
तिश्नगी
ज़िंदगी
की
वो
छटती
नहीं
जानता
हूँ
नहीं
आनी
वो
राह
पर
ज़ेहन
से
क्यूँ
वो
सूरत
भी
हटती
नहीं
है
ख़बर
हो
गया
है
वो
दुश्मन
मगर
शब
बिना
उसके
ये
अब
तो
कटती
नहीं
जाने
किसने
चुराए
हैं
सपने
मेरे
क्यूँ
ये
पलकें
भी
आँखों
से
हटती
नहीं
- Ankur Mishra
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मुझे
दुश्मन
से
भी
ख़ुद्दारी
की
उम्मीद
रहती
है
किसी
का
भी
हो
सर
क़दमों
में
सर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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तुम
सेे
जो
मिला
हूँ
तो
मेरा
हाल
है
बदला
पतझड़
में
भी
जैसे
के
कोई
फूल
खिला
हो
Haider Khan
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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रंज
से
ख़ूगर
हुआ
इंसाँ
तो
मिट
जाता
है
रंज
मुश्किलें
मुझ
पर
पड़ीं
इतनी
कि
आसाँ
हो
गईं
Mirza Ghalib
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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हम
अपनी
जान
के
दुश्मन
को
अपनी
जान
कहते
हैं
मोहब्बत
की
इसी
मिट्टी
को
हिंदुस्तान
कहते
हैं
Rahat Indori
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ज़रा
सा
वक़्त
जो
बदला
तो
हम
पे
हँसने
लगे
हमारे
काँधे
पे
सर
रख
के
रोने
वाले
लोग
Kashif Sayyed
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आप
बच्चों
का
दिल
नहीं
तोड़ें
भाई
ये
दुश्मनी
हमारी
है
Vishnu virat
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उस
दुश्मन-ए-वफ़ा
को
दु'आ
दे
रहा
हूँ
मैं
मेरा
न
हो
सका
वो
किसी
का
तो
हो
गया
Hafeez Banarasi
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कहाँ
की
दोस्ती
किन
दोस्तों
की
बात
करते
हो
मियाँ
दुश्मन
नहीं
मिलता
कोई
अब
तो
ठिकाने
का
Waseem Barelvi
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मेरे
तसव्वुर
से
निकल
जाता
है
क्यूँ
वो
शाम
से
पहले
ही
ढल
जाता
है
क्यूँ
जो
आग
गुज़री
भी
नहीं
छू
कर
कभी
उस
आग
से
ये
जिस्म
जल
जाता
है
क्यूँ
है
टूटना
अंकुर
मुक़द्दर
गर
मिरा
ये
आइना
साँचे
में
ढल
जाता
है
क्यूँ
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Ankur Mishra
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लाद
कर
ज़िंदगी
को
शाने
पे
हैं
खड़े
मौत
के
मुहाने
पे
हर्फ़
दर
हर्फ़
ख़ामुशी
है
बस
लफ़्ज़
बहके
न
लड़खड़ाने
पे
किस
तरह
राब्ते
बढ़ाऊँ
मैं
रूठ
जाता
है
वो
मनाने
पे
अश्क
आँखों
में
रह
गए
तन्हा
एक
क़तरा
नहीं
मुहाने
पे
ये
ज़रूरी
नहीं
मिले
दिल
भी
हाथ
अंकुर
यहाँ
मिलाने
पे
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Ankur Mishra
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पाॅंव
उठते
नहीं
और
चल
पड़ते
हैं
हम
अकेले
ही
घर
से
निकल
पड़ते
हैं
साथ
बहते
हैं
अब
इन
हवाओं
के
हम
लोग
अपनी
ज़मीं
पे
फिसल
पड़ते
हैं
फिर
किया
ही
नहीं
इश्क़
हमनें
कभी
नाम
से
इश्क़
के
पर
मचल
पड़ते
हैं
राज़
रखते
हैं
सीने
में
सारे
मगर
रात
होते
ही
जुगनू
सा
जल
पड़ते
हैं
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Ankur Mishra
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एक
तू
और
तेरी
कमी
से
है
अँधेरा
बहुत
रौशनी
से
किस
तरह
कोई
वा'दा
निभाऊँ
जान
जाती
नहीं
ख़ुद-कुशी
से
ज़ुर्म
को
ज़ुर्म
साबित
करे
क्यूँ
क्यूँ
करें
हम
मोहब्बत
तुझी
से
है
लकीरों
में
ही
फ़ासला
जब
किसलिए
दिल-लगी
ज़िंदगी
से
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
मेरी
ये
बताना
है
'अंकुर'
किसी
से
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Ankur Mishra
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रोए
फिर
हँसकर
दिखाना
ही
पड़ा
हम
भी
ज़िंदा
हैं
बताना
ही
पड़ा
दर्द
हो
जाए
न
तन्हा
इसलिए
भूल
के
सब
मुस्कुराना
ही
पड़ा
रंग
इतने
थे
ज़माने
में
मगर
मय
को
पानी
से
मिलाना
ही
पड़ा
इक
तमन्ना
की
थी
मैंने
और
बस
हाथ
ज़ख़्मों
से
हटाना
ही
पड़ा
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Ankur Mishra
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