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Ankur Mishra
rasm har vo nibhaai gaii hai
rasm har vo nibhaai gaii hai | रस्म हर वो निभाई गई है
- Ankur Mishra
रस्म
हर
वो
निभाई
गई
है
जो
भी
जब
भी
बताई
गई
है
आज
भी
मैं
नहीं
भूला
कुछ
भी
आज
फिर
मय
छुपाई
गई
है
किस
सेे
पूछूँ
मैं
अपना
पता
अब
याद
उसकी
दिलाई
गई
है
पास
कुछ
भी
नहीं
मेरे
बस
ये
बात
यूँँ
ही
उड़ाई
गई
है
- Ankur Mishra
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ख़ास
तो
कुछ
भी
नहीं
बदला
तुम्हारे
बाद
में
पहले
गुम
रहता
था
तुम
में,
अब
तुम्हारी
याद
में
मोल
हासिल
हो
गया
है
मुझको
इक-इक
शे'र
का
सब
दिलासे
दे
रहे
हैं
मुझको
"जस्सर"
दाद
में
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Avtar Singh Jasser
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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'अंजुम'
तुम्हारा
शहर
जिधर
है
उसी
तरफ़
इक
रेल
जा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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जबकि
मैंने
इश्क़
में
मरने
का
वा'दा
कर
लिया
तब
लगा
मुझको
कि
मैंने
इश्क़
ज़्यादा
कर
लिया
Siddharth Saaz
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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अब
तो
उन
की
याद
भी
आती
नहीं
कितनी
तन्हा
हो
गईं
तन्हाइयाँ
Firaq Gorakhpuri
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सुबूत
है
ये
मोहब्बत
की
सादा-लौही
का
जब
उस
ने
वा'दा
किया
हम
ने
ए'तिबार
किया
Josh Malihabadi
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वो
कोई
दोस्त
था
अच्छे
दिनों
का
जो
पिछली
रात
से
याद
आ
रहा
है
Nasir Kazmi
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तुम
उन
के
वा'दे
का
ज़िक्र
उन
से
क्यूँँ
करो
'ग़ालिब'
ये
क्या
कि
तुम
कहो
और
वो
कहें
कि
याद
नहीं
Mirza Ghalib
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आप
की
याद
आती
रही
रात
भर
चश्म-ए-नम
मुस्कुराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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जो
लबों
से
कहा
नहीं
करते
क्या
किसी
के
हुआ
नहीं
करते
बेच
कर
नींद
लाए
हैं
सपने
ख़ुद
से
उसको
जुदा
नहीं
करते
काट
कर
हाथ
लिख
लिया
लेकिन
ख़त
किसी
को
दिया
नहीं
करते
मेरी
शाखों
पे
लिखता
है
वो
पर
ख़ुशबू
उसकी
लिया
नहीं
करते
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Ankur Mishra
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कोई
जिस्म
फिर
या
हवा
हूँ
ख़बर
ही
नहीं
क्या
था
क्या
हूँ
नज़र
आता
है
मुझ
में
कोई
मैं
चेहरा
हूँ
या
आइना
हूँ
है
रिश्ता
मिरा
गहरा
ख़ुद
से
हूँ
खारा
मगर
मैं
हरा
हूँ
नशे
मैं
हूँ
माना
अभी
मैं
मगर
मत
कहो
बे-वफ़ा
हूँ
पता
तो
है
तुझको
मिरा
सब
मैं
क्यूँ
और
कैसे
मरा
हूँ
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Ankur Mishra
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जुगनुओं
की
तरह
ख़ामुशी
से
जल
रहा
हूँ
तिरी
रौशनी
से
तेज
है
धूप
ये
ख़्वाहिशों
की
भीग
जाऊँ
न
मैं
तिश्नगी
से
रोज़
देती
है
दस्तक
नई
इक
ज़िंदगी
खिड़कियों
पे
ख़ुशी
से
हो
गया
हूँ
मैं
आज़िज
बशर
इस
बेमुरव्वत
तिरी
बे-ख़ुदी
से
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Ankur Mishra
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टुकड़ों
में
यूँँ
बिखर
जाएँगे
लोग
तन्हा
ही
मर
जाएँगे
पास
कुछ
भी
बचेगा
नहीं
ख़ाली
घर
उसका
कर
जाएँगे
आँखों
में
होंगे
सपने
मगर
रौशनी
देख
डर
जाएँगे
मिलने
आएगी
जब
बेबसी
शाख़ों
से
सब
उतर
जाएँगे
ख़ाली
पैमाना
रह
जाएगा
पीने
वाले
गुज़र
जाएँगे
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Ankur Mishra
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ये
हवा
ये
फ़ज़ा
दिल
दुखाने
लगे
भूल
जाना
अगर
याद
आने
लगे
शाम
ढलती
है
चादर
लिए
रात
की
इसलिए
आइना
सब
छुपाने
लगे
तंग
हैं
इन
सदाओं
से
हम
भी
मगर
क्या
करें
प्यास
दरिया
बढ़ाने
लगे
उम्र
ढलने
लगी
है
तिरी
ज़िंदगी
हर्फ़-दर-हर्फ़
हम
लड़खड़ाने
लगे
पूछते
थे
पता
लोग
मुझ
सेे
तिरा
इसलिए
हम
क़सम
झूठी
खाने
लगे
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Ankur Mishra
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