gar kuchh ho dard aaina yuñ charkh-e-zisht men | गर कुछ हो दर्द आईना यूँँ चर्ख़-ए-ज़िश्त में

  - Meer Taqi Meer
गरकुछहोदर्दआईनायूँँचर्ख़-ए-ज़िश्तमें
इनसूरतोंकोसिर्फ़करेख़ाक-ओ-ख़िश्तमें
रखताहैसोज़-ए-इश्क़सेदोज़ख़मेंरोज़-ओ-शब
लेजाएगायेसोख़्ता-दिलक्याबहिश्तमें
आसूदाक्यूँँकेहूँमैंकिमानिंद-ए-गर्द-बाद
आवारगीतमामहैमेरीसरिश्तमें
कबतकख़राबसई-ए-तवाफ़-ए-हरमरहूँ
दिलकोउठाकेबैठरहूँगाकुनिश्तमें
मातमकेहूँज़मीनपेख़िर्मनतोक्याअजब
होताहैनीलचर्ख़कीउससब्ज़किश्तमें
सरमस्तहमहैंआँखोंकेदेखेसेयारकी
कबयेनशाहैदुख़्तर-ए-रज़तुझपलिश्तमें
रिंदोंकेतईंहमेशामलामतकरेहैतू
आजाइयोशैख़कहींहश्त-बहिश्तमें
ना
मेंकोचाककरकेकरेनामा-बरकोक़त्ल
क्यायेलिखाथा'मीर'मरीसर-नविश्तमें
  - Meer Taqi Meer
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