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Kabir Altamash
jin par bojh lada ho bas kaanton ka
jin par bojh lada ho bas kaanton ka | जिन पर बोझ लदा हो बस काँटों का
- Kabir Altamash
जिन
पर
बोझ
लदा
हो
बस
काँटों
का
जाने
क्या
होता
है
उन
पौधों
का
इक
लड़की
जो
मेरी
महबूबा
थी
मामा
हूँ
अब
मैं
उसके
बच्चों
का
अब
मैं
भी
तो
उसके
पास
नहीं
हूँ
क्या
होता
होगा
उसकी
होंठों
का
कौन
सँवारेगा
अब
उनकी
ज़ुल्फ़ें
जाने
क्या
होगा
उनकी
ज़ुल्फ़ों
का
- Kabir Altamash
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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वहम
होता
है
कि
छूने
से
सँवर
जाएँगी
सोचता
हूँ
जो
मुक़द्दर
मिरा
ज़ुल्फ़ें
तेरी
Neeraj Neer
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जब
यार
ने
उठा
कर
ज़ुल्फ़ों
के
बाल
बाँधे
तब
मैं
ने
अपने
दिल
में
लाखों
ख़याल
बाँधे
Mohammad Rafi Sauda
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ये
साड़ी
खुले
बाल
क़यामत-सी
निगाहें
हम
ख़ुद
को
बहकने
से
भला
कैसे
बचायें
Harsh saxena
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है
उस
बदन
की
लत
मुझे
सो
दूसरा
बदन
अच्छा
तो
लग
रहा
है
मेरे
काम
का
नहीं
Vishnu virat
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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मुँह
पर
नक़ाब-ए-ज़र्द
हर
इक
ज़ुल्फ़
पर
गुलाल
होली
की
शाम
ही
तो
सहर
है
बसंत
की
Lala Madhav Ram Jauhar
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हिज्र
में
तुमने
केवल
बाल
बिगाड़े
हैं
हमने
जाने
कितने
साल
बिगाड़े
हैं
Anand Raj Singh
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आह
को
चाहिए
इक
उम्र
असर
होने
तक
कौन
जीता
है
तिरी
ज़ुल्फ़
के
सर
होने
तक
Mirza Ghalib
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घिन
आ
रही
है
आशिक़ी
से
अब
मुझे
इस
आशिक़ी
इस
ज़िन्दगी
से
अब
मुझे
मैं
देख
लूँगा
ख़ुद
को
मुस्काते
हुए
तुम
देख
लेना
बस
ख़ुशी
से
अब
मुझे
मिलता
नहीं
जब
प्यार
मुझको
यूँँ
कभी
फिर
प्यार
क्यूँ
करना
किसी
से
अब
मुझे
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Kabir Altamash
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तुमको
है
बस
आमों
का
दुख
हमको
है
सब
पेड़ों
का
दुख
तुम
तो
इक
लड़की
हो
पगली
तुम
क्या
जानो
लड़कों
का
दुख
ऐ
रस्तों
पर
चलने
वालों
कब
समझोगे
रस्तों
का
दुख
जिन
लम्हों
में
टूट
गया
मैं
मुझको
है
उन
लम्हों
का
दुख
ऐ
ब्लूटूथ
लगाने
वाले
तुम
क्या
जानो
बहरों
का
दुख
तुमको
है
बस
इक
अपना
दुख
रब
को
है
हम
बंदों
का
दुख
उसको
चूम
नहीं
पाया
मैं
मुझ
सेे
पूछो
होंठों
का
दुख
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Kabir Altamash
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अब
उस
सेे
यार
हरगिज़
भी
किनारा
हो
नहीं
सकता
मगर
वो
शख़्स
तो
फिर
भी
हमारा
हो
नहीं
सकता
ये
कैसे
मान
बैठे
तुम
कि
वो
अब
भी
तुम्हारा
है
तुम्हारा
है
तो
फिर
वो
क्यूँ
तुम्हारा
हो
नहीं
सकता
मैं
जिसके
वास्ते
सब
भूल
बैठा
हूँ
वो
कहती
है
सुनो
लड़के
हमारा
अब
गुज़ारा
हो
नहीं
सकता
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Kabir Altamash
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मैंने
अब
तो
तन्हाई
को
भी
छोड़
दिया
इतना
तन्हा
कोई
ख़ुद
को
करता
है
क्या?
Kabir Altamash
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थक
गए
हम
ज़िंदगी
से
जी
रहे
हैं
बेबसी
से
अब
पढ़ाई
ही
करूँगा
भर
गया
मन
आशिक़ी
से
दोस्त
तुम
सेे
पूछना
था
कुछ
मिला
क्या
दुश्मनी
से
हूँ
अकेला
ज़िंदगी
में
मुझको
क्या
है
फ़रवरी
से
जल
रहे
हैं
अबके
सारे
आदमी
ही
आदमी
से
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Kabir Altamash
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