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Kabir Altamash
ab usse yaar hargiz bhi kinaara ho nahin saka
ab usse yaar hargiz bhi kinaara ho nahin saka | अब उस सेे यार हरगिज़ भी किनारा हो नहीं सकता
- Kabir Altamash
अब
उस
सेे
यार
हरगिज़
भी
किनारा
हो
नहीं
सकता
मगर
वो
शख़्स
तो
फिर
भी
हमारा
हो
नहीं
सकता
ये
कैसे
मान
बैठे
तुम
कि
वो
अब
भी
तुम्हारा
है
तुम्हारा
है
तो
फिर
वो
क्यूँ
तुम्हारा
हो
नहीं
सकता
मैं
जिसके
वास्ते
सब
भूल
बैठा
हूँ
वो
कहती
है
सुनो
लड़के
हमारा
अब
गुज़ारा
हो
नहीं
सकता
- Kabir Altamash
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हाथ
छूटें
भी
तो
रिश्ते
नहीं
छोड़ा
करते
वक़्त
की
शाख़
से
लम्हे
नहीं
तोड़ा
करते
Gulzar
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फिर
उसके
बाद
कोई
सिलसिला
नहीं
रक्खा
जिसे
मुआ'फ़
किया,
राब्ता
नहीं
रक्खा
Renu Nayyar
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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तुम्हारा
तो
ख़ुदास
राबता
है
तो
देखो
ना,
हमारे
दुख
बता
कर
Siddharth Saaz
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शायद
आ
जाए
कभी
देखने
वो
रश्क-ए-मसीह
मैं
किसी
और
से
इस
वास्ते
अच्छा
न
हुआ
Anwar Taban
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ऐसी
हैं
क़ुर्बतें
के
मुझी
में
बसा
है
वो
ऐसे
हैं
फ़ासले
के
नहीं
राब्ता
नसीब
Afzal Ali Afzal
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मैं
शाइर
उसको
चूड़ी
ही
दे
सकता
था
बस
रिश्ता
सोने
के
कंगन
देने
पर
होता
है
Neeraj Neer
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मिला
है
दुख
सदा
मुझको
मेरा
दुख
से
ये
नाता
है
मिरे
ख़ुद
घाव
में
मरहम
लगा
कर
दुख
सुलाता
है
Tiwari Jitendra
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ले
आता
हूँ
हर
रिश्ते
को
झगड़े
तक
फिर
झगड़े
से
काम
चलाता
रहता
हूँ
Shariq Kaifi
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किस
वास्ते
लिक्खा
है
हथेली
पे
मिरा
नाम
मैं
हर्फ़-ए-ग़लत
हूँ
तो
मिटा
क्यूँँ
नहीं
देते
Hasrat Jaipuri
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अच्छा
होगा
गर
ऐसा
हो
जाए
एक
पराया
ही
अपना
हो
जाए
होने
को
तो
कुछ
भी
हो
सकता
है
क्या
होगा
गर
तू
मेरा
हो
जाए
उसपर
तन्हाई
अच्छी
लगती
है
काश
कभी
वो
भी
तन्हा
हो
जाए
मैं
बेकार
नहीं
रोया
करता
हूँ
चाह
रहा
हूँ
तू
ज़िंदा
हो
जाए
रब
को
नौकर
तक
ये
बोल
रहा
है
मेरा
मालिक
बस
अच्छा
हो
जाए
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Kabir Altamash
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जिन
पर
बोझ
लदा
हो
बस
काँटों
का
जाने
क्या
होता
है
उन
पौधों
का
इक
लड़की
जो
मेरी
महबूबा
थी
मामा
हूँ
अब
मैं
उसके
बच्चों
का
अब
मैं
भी
तो
उसके
पास
नहीं
हूँ
क्या
होता
होगा
उसकी
होंठों
का
कौन
सँवारेगा
अब
उनकी
ज़ुल्फ़ें
जाने
क्या
होगा
उनकी
ज़ुल्फ़ों
का
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Kabir Altamash
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दोस्त
गर
तू
पलट
नहीं
सकता
मैं
भी
तुझ
सेे
लिपट
नहीं
सकता
यार
वो
ख़ुद-कुशी
न
कर
ले
कहीं
यार
मैं
पीछे
हट
नहीं
सकता
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Kabir Altamash
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वहीं
पर
इक
जवानी
चल
रही
है
जहाँ
कोई
जवानी
ढल
रही
है
मैं
हूँ
मिट्टी
मगर
हूँ
उसके
हाथों
मुझे
वो
अपने
हाथों
मल
रही
है
तुम्हें
अब
वास्ता
क्यूँ
होगा
हम
सेे
तुम्हारी
ज़िन्दगी
तो
चल
रही
है
मुझे
तुझ
सेे
मुहब्बत
गर
नहीं
थी
मुझे
तेरी
कमी
क्यूँ
खल
रही
है
उसे
कुछ
मत
कहो
मेरे
रक़ीबों
वो
मेरे
मस'अलों
का
हल
रही
है
ये
धोका
बे-वफ़ाई
और
नफ़रत
वो
हर
इक
काम
में
अव्वल
रही
है
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Kabir Altamash
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कितनी
ही
शर्म
की
बात
है
कि
तुम
मेरे
होते
हुए
भी
उदास
हो
Kabir Altamash
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