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Kabir Altamash
achha hogaa gar aisa ho jaa.e
achha hogaa gar aisa ho jaa.e | अच्छा होगा गर ऐसा हो जाए
- Kabir Altamash
अच्छा
होगा
गर
ऐसा
हो
जाए
एक
पराया
ही
अपना
हो
जाए
होने
को
तो
कुछ
भी
हो
सकता
है
क्या
होगा
गर
तू
मेरा
हो
जाए
उसपर
तन्हाई
अच्छी
लगती
है
काश
कभी
वो
भी
तन्हा
हो
जाए
मैं
बेकार
नहीं
रोया
करता
हूँ
चाह
रहा
हूँ
तू
ज़िंदा
हो
जाए
रब
को
नौकर
तक
ये
बोल
रहा
है
मेरा
मालिक
बस
अच्छा
हो
जाए
- Kabir Altamash
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दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
Ammar Iqbal
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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नाप
रहा
था
एक
उदासी
की
गहराई
हाथ
पकड़कर
वापस
लायी
है
तन्हाई
वस्ल
दिनों
को
काफ़ी
छोटा
कर
देता
है
हिज्र
बढ़ा
देता
है
रातों
की
लम्बाई
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Tanoj Dadhich
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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हम
दोनों
मिल
कर
भी
दिलों
की
तन्हाई
में
भटकेंगे
पागल
कुछ
तो
सोच
ये
तूने
कैसी
शक्ल
बनाई
है
Jaun Elia
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ऐब
हज़ारों
दिखते
हैं
मुझको
मेरी
परछाई
में
यानी
शीशे
से
मिलता
हूँ
अक्सर
मैं
तन्हाई
में
Ravi 'VEER'
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दबी
कुचली
हुई
सब
ख़्वाहिशों
के
सर
निकल
आए
ज़रा
पैसा
हुआ
तो
च्यूँँटियों
के
पर
निकल
आए
अभी
उड़ते
नहीं
तो
फ़ाख़्ता
के
साथ
हैं
बच्चे
अकेला
छोड़
देंगे
माँ
को
जिस
दिन
पर
निकल
आए
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Mehshar Afridi
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यदि
अंधकार
से
लड़ने
का
संकल्प
कोई
कर
लेता
है
तो
एक
अकेला
जुगनू
भी
सब
अन्धकार
हर
लेता
है
Balkavi Bairagi
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तुम
सेे
मिल
कर
ये
कहना
है
मुझको
साथ
तुम्हारे
ही
रहना
है
मुझको
एक
नदी
हो
तुम
उस
गंगा
जैसी
तुझ
में
अब
घुल
कर
बहना
है
मुझको
बाद
तुम्हारे
मैं
मरने
जाऊँगा
बाद
तुम्हारे
क्यूँ
रहना
है
मुझको
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Kabir Altamash
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पहले
करते
थे
पाप
अच्छा
जी
अच्छे
हैं
कब
से
आप
अच्छा
जी
आपसे
भूल
हो
गई
अच्छा
करना
है
फिर
मिलाप
अच्छा
जी
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Kabir Altamash
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वहीं
पर
इक
जवानी
चल
रही
है
जहाँ
कोई
जवानी
ढल
रही
है
मैं
हूँ
मिट्टी
मगर
हूँ
उसके
हाथों
मुझे
वो
अपने
हाथों
मल
रही
है
तुम्हें
अब
वास्ता
क्यूँ
होगा
हम
सेे
तुम्हारी
ज़िन्दगी
तो
चल
रही
है
मुझे
तुझ
सेे
मुहब्बत
गर
नहीं
थी
मुझे
तेरी
कमी
क्यूँ
खल
रही
है
उसे
कुछ
मत
कहो
मेरे
रक़ीबों
वो
मेरे
मस'अलों
का
हल
रही
है
ये
धोका
बे-वफ़ाई
और
नफ़रत
वो
हर
इक
काम
में
अव्वल
रही
है
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Kabir Altamash
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हम
ज़रा
क्या
खफा
हो
गए
आप
तो
बे-वफ़ा
हो
गए
जान
थे
आप
मेरे
कभी
जान,
लेकिन
जुदा
हो
गए
है
बहुत
ही
बड़ा
मसअला
आप
ही
मसअला
हो
गए
चाहते
थे
मुझे
और
अब
जाने
किसपर
फिदा
हो
गए
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Kabir Altamash
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मुझको
ख़ुद
से
बहुत
डर
लगता
है
कोई
दिन
मार
न
डालूं
ख़ुद
को
Kabir Altamash
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