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Harsh Kumar Bhatnagar
zaKHm usko lagaane diya hai
zaKHm usko lagaane diya hai | ज़ख़्म उसको लगाने दिया है
- Harsh Kumar Bhatnagar
ज़ख़्म
उसको
लगाने
दिया
है
दिल
के
अंदर
भी
आने
दिया
है
वो
मुझे
छोड़ने
वाला
है
सो
मैंने
भी
उसको
जाने
दिया
है
उस
पिता
ने
कमाया
था
जो
भी
बच्चों
को
अब
उड़ाने
दिया
है
दर्द
ग़ज़लों
में
कम
पड़
न
जाए
दिल
ये
सब
को
दुखाने
दिया
है
- Harsh Kumar Bhatnagar
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निभेगी
किस
तरह
दिल
सोचता
है
अजब
लड़की
है
जब
देखो
ख़फ़ा
है
Fuzail Jafri
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दिल
गया
रौनक़-ए-हयात
गई
ग़म
गया
सारी
काएनात
गई
Jigar Moradabadi
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
Ammar Iqbal
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दिल
हारने
के
बाद
ही
आता
है
ये
सुख़न
अब
तक
किसी
ने
कोख
से
शायर
नहीं
जना
Anas Khan
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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तिरंगा
दिल
में
है
लबों
पे
हिंदुस्तान
रखता
हूँ
सिपाही
हूँ
हथेली
पे
मैं
अपनी
जान
रखता
हूँ
Shashank Shekhar Pathak
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अगर
हमारे
ही
दिल
में
ठिकाना
चाहिए
था
तो
फिर
तुझे
ज़रा
पहले
बताना
चाहिए
था
Shakeel Jamali
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गर
गले
मिलना
है
तो
ख़ुशी
में
मिलो
उसकी
चाहत
है
तो
फ़रवरी
में
मिलो
फूल
तो
तुझको
हम
दे
ही
देंगे
मगर
पहले
आ
कर
के
पिछली
गली
में
मिलो
एक
बोसे
की
ख़ातिर
ही
बैठा
हूँ
मैं
तुम
मुझे
चाँद
की
चाँदनी
में
मिलो
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Harsh Kumar Bhatnagar
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पास
उसके
मैं
गया
था
धीरे
धीरे
हाथ
उसका
मैंने
पकड़ा
धीरे
धीरे
वो
लगी
थी
भागने
शर्माके
मुझ
सेे
कर
लिया
था
बंद
कमरा
धीरे
धीरे
कर
रही
थी
ठीक
जब
वो
पल्लू
अपना
मैंने
भी
पर्दा
गिराया
धीरे
धीरे
है
मोहब्बत
के
निशाँ
मेरे
बदन
पे
उसने
जब
था
मुझ
को
चूमा
धीरे
धीरे
ग़ज़लें
मेरी
भी
मुकम्मल
हो
रहीं
हैं
जब
से
महफ़िल
में
वो
आया
धीरे
धीरे
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Harsh Kumar Bhatnagar
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मुसीबतों
से
भरी
ज़िंदगी
है
मजनूँ
की
शब-ए-फ़िराक़
में
लैला
दिखी
है
मजनूँ
की
ब-ख़ूबी
जानती
है
मेरा
हाल
ये
दुनिया
वो
इसलिए
कि
उदासी
लिखी
है
मजनूँ
की
लगेगा
वक़्त
तलफ़्फ़ुज़
को
साफ़
होने
में
पकड़
ग़ज़ल
पे
अभी
तो
बनी
है
मजनूँ
की
उमड़
रही
है
जवानी
भी
सब
में
बार-ए-दिगर
वो
जब
से
फोटो
पुरानी
मिली
है
मजनूँ
की
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Harsh Kumar Bhatnagar
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जब
लगा
बिकने
मैं
बाज़ार
में
आसानी
से
लोग
जलने
लगे
थे
मेरी
दरख़्शानी
से
फ़िक्र
करने
की
ये
आदत
से
तिरी
डरता
हूँ
मैं
कहीं
ऊब
न
जाऊँ
ये
निगहबानी
से
जब
मिरे
अपने
गवाहों
ने
मुझे
छोड़ा
था
देखता
रह
गया
मैं
ख़ुद
को
ही
हैरानी
से
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Harsh Kumar Bhatnagar
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सज़ा
के
वक़्त
हमें
सर-निगूँ
हो
जाना
था
वो
इसलिए
कि
ज़माने
को
हद
में
लाना
था
जहाँ
पे
गूँज
उठे
हर
सदा
वहीं
पे
मुझे
परिंदे
साथ
में
रखने
थे
घर
बसाना
था
ये
आसमाँ
ये
परिंदे
ये
फूल
ये
दुनिया
सिवाए
इश्क़
सभी
को
ग़ज़ल
में
लाना
था
बिना
मलाल
किए
ज़िंदगी
भी
कट
रही
है
मैं
सोचता
हूँ
किसी
से
तो
दिल
लगाना
था
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Harsh Kumar Bhatnagar
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