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Harsh Kumar Bhatnagar
gar gale milnaa hai to KHushi men milo
gar gale milnaa hai to KHushi men milo | गर गले मिलना है तो ख़ुशी में मिलो
- Harsh Kumar Bhatnagar
गर
गले
मिलना
है
तो
ख़ुशी
में
मिलो
उसकी
चाहत
है
तो
फ़रवरी
में
मिलो
फूल
तो
तुझको
हम
दे
ही
देंगे
मगर
पहले
आ
कर
के
पिछली
गली
में
मिलो
एक
बोसे
की
ख़ातिर
ही
बैठा
हूँ
मैं
तुम
मुझे
चाँद
की
चाँदनी
में
मिलो
- Harsh Kumar Bhatnagar
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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हमेशा
हाथों
में
होते
हैं
फूल
उनके
लिए
किसी
को
भेज
के
मँगवाने
थोड़ी
होते
हैं
Anwar Shaoor
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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वक़्त
किस
तेज़ी
से
गुज़रा
रोज़-मर्रा
में
'मुनीर'
आज
कल
होता
गया
और
दिन
हवा
होते
गए
Muneer Niyazi
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मैं
चोट
कर
तो
रहा
हूँ
हवा
के
माथे
पर
मज़ा
तो
जब
था
कि
कोई
निशान
भी
पड़ता
Abhishek shukla
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फूल
ही
फूल
याद
आते
हैं
आप
जब
जब
भी
मुस्कुराते
हैं
Sajid Premi
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कोई
तितली
पकड़
लें
अगर
फूल
पर
रख
दिया
कीजिए
Vikas Rana
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मुहब्बत
के
समुंदर
की
कलाकारी
ग़ज़ब
की
है
कि
सब
कुछ
डूब
जाता
है
मगर
तर
कुछ
नहीं
होता
Muntazir Firozabadi
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साथ
चलते
जा
रहे
हैं
पास
आ
सकते
नहीं
इक
नदी
के
दो
किनारों
को
मिला
सकते
नहीं
उसकी
भी
मजबूरियाँ
हैं
मेरी
भी
मजबूरियाँ
रोज़
मिलते
हैं
मगर
घर
में
बता
सकते
नहीं
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Bashir Badr
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गुलशन
से
कोई
फूल
मुयस्सर
न
जब
हुआ
तितली
ने
राखी
बाँध
दी
काँटे
की
नोक
पर
Unknown
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पाँच
सालों
की
मोहब्बत
को
भुला
देना
है
अब
कब
तलक
मैं
हिज्र
में
ही
शा'इरी
करता
फिरूँ
Harsh Kumar Bhatnagar
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रुमूज़-ए-इश्क़
ज़ियादा
छिपा
नहीं
सकते
मगर
ये
राज़
सभी
को
बता
नहीं
सकते
जो
कार-ए-इश्क़
से
बाहर
निकल
नहीं
पाए
वो
मेहर-ओ-माह
के
सपने
सजा
नहीं
सकते
हमें
बता
कोई
तदबीर
भूल
जाने
की
यूँँ
रोज़
रोज़
तो
आँसू
बहा
नहीं
सकते
उदासी
फेंक
दी
उम्र-ए-रवाँ
के
पैरों
में
बिछड़ने
वाले
मुझे
अब
रुला
नहीं
सकते
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Harsh Kumar Bhatnagar
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एक
दूजे
के
लिए
अब
कोई
पागल
नहीं
है
अब
मुनासिब
है
कोई
अपने
ही
जैसा
ढूँडे
Harsh Kumar Bhatnagar
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वो
किसी
और
की
होने
वाली
है
अब
यार
अब
तो
ग़ज़ल
लिखना
भी
बनता
है
Harsh Kumar Bhatnagar
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कभी
आसान
करती
है
कभी
मुश्किल
बढ़ाती
है
ये
दुनिया
मार
के
ठोकर
हमें
चलना
सिखाती
है
Harsh Kumar Bhatnagar
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