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Harsh Kumar Bhatnagar
museebaton se bharii zindagi hai majnoon kii
museebaton se bharii zindagi hai majnoon kii | मुसीबतों से भरी ज़िंदगी है मजनूँ की
- Harsh Kumar Bhatnagar
मुसीबतों
से
भरी
ज़िंदगी
है
मजनूँ
की
शब-ए-फ़िराक़
में
लैला
दिखी
है
मजनूँ
की
ब-ख़ूबी
जानती
है
मेरा
हाल
ये
दुनिया
वो
इसलिए
कि
उदासी
लिखी
है
मजनूँ
की
लगेगा
वक़्त
तलफ़्फ़ुज़
को
साफ़
होने
में
पकड़
ग़ज़ल
पे
अभी
तो
बनी
है
मजनूँ
की
उमड़
रही
है
जवानी
भी
सब
में
बार-ए-दिगर
वो
जब
से
फोटो
पुरानी
मिली
है
मजनूँ
की
- Harsh Kumar Bhatnagar
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अँधेरे
में
ला
कर
बुझा
देना
मुझको
किसी
कोने
में
रख
भुला
देना
मुझको
गिरा
कर
तू
ऊँची
जगह
से
मुझे
फिर
बहाना
बना
कर
छुपा
देना
मुझको
ख़ुशी
से
बदन
पे
मिरे
ज़ख़्म
देना
मगर
ज़ख़्म
दे
कर
सुला
देना
मुझको
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चैन
की
नींद
पाने
की
ख़ातिर
मुझे
शा'इरी
को
गले
इक
लगाना
पड़ा
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ये
मिरा
घर
बड़ा
अकेला
है
टूटा
कमरा
है
छत
है
पर्दा
है
अब
ग़ज़ल
भी
लिखी
नहीं
जाती
अब
न
वो
है
न
उसका
चेहरा
है
वो
जो
मेरा
है
भी
नहीं
फिर
भी
दिल
ये
उसके
लिए
धड़कता
है
हाथ
तेरा
है
उसके
हाथों
में
बस
यही
ख़्वाब
मुझको
आता
है
जब
से
वो
बदला
है
मिरा
भी
अब
हाल
तो
शायरों
के
जैसा
है
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आख़िरी
वक़्त
पे
वो
कहते
रहे
दो
हफ़्ते
थी
मोहब्बत
हमें
सो
रुक
गए
थे
दो
हफ़्ते
वक़्त
मिलने
का
बताया
था
सवा
दो
के
बाद
वो
खड़ी
दूर
थी
सो
मैंने
सुने
दो
हफ़्ते
यूँँ
मिनट
होते
हैं
दो
हफ़्तों
में
कुछ
बीस
हज़ार
क्या
तू
रह
लेगा
कभी
बिन
मिरे
ये
दो
हफ़्ते
दो
महीने
से
तुम्हारा
कोई
ख़त
आया
नहीं
इक
मिरे
पास
भी
हैं
सिर्फ़
बचे
दो
हफ़्ते
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वो
मुझे
छोड़
कर
भी
नहीं
जा
रहा
पर
मिरे
पास
भी
वो
कहाँ
आ
रहा
वो
परिंदा
भी
अब
उड़
गया
है
कहीं
वो
मेरी
छत
पे
वापस
नहीं
आ
रहा
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