aaj phir shaakh se gire patte | आज फिर शाख़ से गिरे पत्ते

  - Kaif Ahmad Siddiqui
आजफिरशाख़सेगिरेपत्ते
औरमिट्टीमेंमिलगएपत्ते
जानेकिसदश्तकीतलाशमेंहैं
रेगज़ारोंमेंचीख़तेपत्ते
कलजिन्हेंआसमाँपेदेखाथा
आजपातालमेंमिलेपत्ते
अपनीआवाज़हीसेख़ौफ़-ज़दा
शाख़-दर-शाख़काँपतेपत्ते
मुझकोइकबर्ग-ए-ख़ुश्कभीमिला
अबकहाँबाग़मेंहरेपत्ते
सारेगुलशनकोदेगएसोना
औरख़ुदख़ाकबनगएपत्ते
'कैफ़'वीरानी-ए-गुलिस्ताँभी
बाज़औक़ातलेउड़ेपत्ते
  - Kaif Ahmad Siddiqui
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