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A R Sahil "Aleeg"
sahne waale ko gar sabr aa jaa.e to phir samjho
sahne waale ko gar sabr aa jaa.e to phir samjho | सहने वाले को गर सब्र आ जाए तो फिर समझो
- A R Sahil "Aleeg"
सहने
वाले
को
गर
सब्र
आ
जाए
तो
फिर
समझो
कहने
वालों
की
औक़ात
फ़क़त
दो
कौड़ी
की
है
- A R Sahil "Aleeg"
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तसव्वुर
तजरबा
तेवर
तमन्ना
और
तन्हाई
मिलेंगे
फूल
सब
इस
में
ग़ज़ल
गुलदान
है
यारों
पढ़ाई
नौकरी
शादी
फिर
उसके
बाद
दो
बच्चे
हमारी
ज़िन्दगी
इतनी
कहाँ
आसान
है
यारों
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Tanoj Dadhich
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सौ
चाँद
भी
चमकेंगे
तो
क्या
बात
बनेगी
तुम
आए
तो
इस
रात
की
औक़ात
बनेगी
Dagh Dehlvi
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ऐसे
तेवर
दुश्मन
ही
के
होते
हैं
पता
करो
ये
लड़की
किस
की
बेटी
है
Zia Mazkoor
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तू
भी
सादा
है
कभी
चाल
बदलता
ही
नहीं
हम
भी
सादा
हैं
इसी
चाल
में
आ
जाते
हैं
Afzal Khan
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ये
हुनर
रब
ने
मेरी
ज़ात
में
रक्खा
हुआ
है
अच्छे
अच्छो
को
भी
औक़ात
में
रक्खा
हुआ
है
Fareeha Naqvi
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लहजा
ही
थोड़ा
तल्ख़
है
दुनिया
के
सामने
वैसे
तो
ठीक
ठाक
हूँ
मैं
बोल-चाल
में
Ankit Maurya
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ऐसे
डरे
हुए
हैं
ज़माने
की
चाल
से
घर
में
भी
पाँव
रखते
हैं
हम
तो
सँभाल
कर
Adil Mansuri
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चराग़
दिल
का
मुक़ाबिल
हवा
के
रखते
हैं
हर
एक
हाल
में
तेवर
बला
के
रखते
हैं
Hastimal Hasti
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नाराज़गी
का
मेरी
ये
आलम
है
इन
दिनों
है
बंद
अपने
आप
से
भी
बोल-चाल
यार
Rajesh Reddy
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पहले
तो
तुम्हें
जान
पुकारेंगे
यही
लोग
फिर
ख़ुद
ही
तुम्हें
जान
से
मारेंगे
यही
लोग
मुँह
पर
तो
बड़े
फ़ख्र
से
ता'ईद
करेंगे
फिर
पीठ
में
खंज़र
भी
उतारेंगे
यही
लोग
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Ashraf Ali
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है
ग़ज़ल
की
नाज़ुकी
या
बेवफ़ाई-
ए-ग़ज़ाला
रो
रहे
हैं
इश्क़
के
सब
शे'र
मेरी
हर
ग़ज़ल
के
A R Sahil "Aleeg"
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रहा
है
इस
साल
भी
रब
ख़फ़ा
मुझ
सेे,
मैं
भी
रब
से
न
बदला
अपनी
दु'आ
मैं,
न
रब
ने
अपना
इरादा
A R Sahil "Aleeg"
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औसतन
साठ
साल
की
ज़िंदगी
जब
मुहाल
है
आरज़ू
उम्र-ए-आख़िरत
और
जन्नत
की
क्यूँ
करूँं?
A R Sahil "Aleeg"
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ख़ुश
रहो
और
मुझे
भी
रहने
दो
एक
जुमले
में
ख़त्म
इश्क़
हुआ
A R Sahil "Aleeg"
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जो
मुझे
हर
तरफ़
से
घेरे
हैं
ये
ग़मों
के
हसीं
अँधेरे
हैं
जिनको
रहबर
समझ
रहा
है
तू
ग़ौर
से
देख
सब
लुटेरे
हैं
अब
किधर
आशियाँ
बनाएँ
हम
चार-सू
बिजलियों
के
डेरे
हैं
मुँह
छुपाएँ
घटाएँ
शरमाएँ
बाल
उसने
भी
क्या
बिखेरे
हैं
लब
पे
ता'रीफ़ें
हैं
रक़ीबों
की
वैसे
वो
जाँ-निसार
मेरे
हैं
और
तो
कुछ
नहीं
बचा
है
इधर
दिल
में
ज़ख़्मों
के
उजड़े
डेरे
हैं
दरमियाँ
यूँँ
हुआ
है
बँटवारा
सब
ख़ुशी
उनकी
रंज
मेरे
हैं
गुल
तो
सारे
निगल
चुकी
है
ख़िज़ाँ
अब
तो
शाख़ों
को
ख़ार
घेरे
हैं
मुझको
'साहिल'
नवाज़ते
हैं
ग़म
जितने
ये
ग़म-गुसार
मेरे
हैं
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A R Sahil "Aleeg"
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