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A R Sahil "Aleeg"
Jo mujhe har taraf se ghere hain
जो मुझे हर तरफ़ से घेरे हैं
- A R Sahil "Aleeg"
जो
मुझे
हर
तरफ़
से
घेरे
हैं
ये
ग़मों
के
हसीं
अँधेरे
हैं
जिनको
रहबर
समझ
रहा
है
तू
ग़ौर
से
देख
सब
लुटेरे
हैं
अब
किधर
आशियाँ
बनाएँ
हम
चार-सू
बिजलियों
के
डेरे
हैं
मुँह
छुपाएँ
घटाएँ
शरमाएँ
बाल
उसने
भी
क्या
बिखेरे
हैं
लब
पे
ता'रीफ़ें
हैं
रक़ीबों
की
वैसे
वो
जाँ-निसार
मेरे
हैं
और
तो
कुछ
नहीं
बचा
है
इधर
दिल
में
ज़ख़्मों
के
उजड़े
डेरे
हैं
दरमियाँ
यूँँ
हुआ
है
बँटवारा
सब
ख़ुशी
उनकी
रंज
मेरे
हैं
गुल
तो
सारे
निगल
चुकी
है
ख़िज़ाँ
अब
तो
शाख़ों
को
ख़ार
घेरे
हैं
मुझको
'साहिल'
नवाज़ते
हैं
ग़म
जितने
ये
ग़म-गुसार
मेरे
हैं
- A R Sahil "Aleeg"
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एक
मुद्दत
बाद
देखा
आइना
जब
मैंने
तो
ये
याद
आया
इश्क़
से
पहले
मैं
क्या
था
इश्क़
कर
के
अब
मैं
भी
क्या
बन
गया
हूँ
A R Sahil "Aleeg"
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ग़ज़ल
या
इश्क़
हो
कोई
किसी
का
भी
कभी
दुनिया
में
कामिल
हो
नहीं
पाता
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
में
मुझ
को
मिली
जो
बे-वफ़ाई
अस्ल
में
ये
तो
सज़ा
सच
कहने
की
है
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
अगर
मैं
किया
नहीं
होता
ज़ीस्त
मेरी
सँवर
गई
होती
A R Sahil "Aleeg"
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प्यार
चाहे
तुम
कई
बार
कर
लेना
ज़िंदगी
में
इश्क़
इक
बार
होता
है
A R Sahil "Aleeg"
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