aadmi tha kya vahii ik kaam ka | आदमी था क्या वही इक काम का

  - Jagdeesh Raj Figar
आदमीथाक्यावहीइककामका
अर्ज़परजिसकाकोईमस्कनथा
जोकिसीनेपैरहनमुझकोदिया
वोमिरेहीतनकाहिस्साबनगया
हमथेजुड़वाँइसलिएतनएकथा
एकसर्जननेअलगहमकोकिया
जलमेंजबतकमैंरहाज़िंदारहा
तटपेसागरकेमैंकरमरगया
जबकभीमैंसोचनेकुछलगपड़ा
दूरतकफिरसिलसिलाचलतारहा
मैंज़मींपरइकतरहकाबोझथा
वोतोमाँथीउसकोयेसहनापड़ा
वज्दमेंआताकभीतोपेड़की
टहनियोंपरचढ़केअक्सरझूलता
थामैंसालिकइकअनोखादहरमें
जोभीमस्लकमिलगयामैंचलपड़ा
आलम-ए-जबरूतकासाकिनथामैं
आलम-ए-सिफ़्लीमेंकैसेगया
हादसेकोरोकनाथाइसलिए
रास्तेपरहोगयाजाकरखड़ा
बंदकरतेथेकभीथेखोलते
रूपदरवाज़ेकामुझकोक्यामिला
लेटजातापीठकेबलफ़र्शपर
देखलेताजबभीआतेमेंक़ज़ा
जोसमावीथेक़मरपरजाबसे
मैंथाख़ाकीदहरमेंहीरहगया
मुझकोदेनाथा'फ़िगार'उनकाजवाब
चिट्ठियोंकासामनेअम्बारथा
  - Jagdeesh Raj Figar
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