macha kohraam kyun hai | मचा कोहराम क्यूँँ है

  - Jafar Sahni
मचाकोहरामक्यूँँहै
घरबदलनेपर
अभीभीहल्केकाले
शीशेवाली
आँखपरऐनकलगाकर
हल्क़ा-ए-याराँमेंवोअक्सर
चहल-क़दमीकोआताहै
सुनाताहैग़ज़लअपनी
कभीतारोंकीझुरमुटमें
कभीरस्तेमेंशबनमके
कभीख़ुशबूलपेटेजिस्मपर
दिल-कशफ़ज़ाओंमें
कभीबे-हदचमकतीधूपके
पीपलकीछाँवमें
ज़रासा
चश्म-ए-बातिनको
मुनव्वरकरकेतोदेखो
लिएदरियाकोहाथोंमें
बहुतशादाँ
बहुतफ़रहाँ
नज़रआताहैमसनदपर
ग़ज़लकीवो
  - Jafar Sahni
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