kuchh bhi to apne paas nahin juz-mata-e-dil | कुछ भी तो अपने पास नहीं जुज़-मता-ए-दिल

  - Ibn-e-Safi
कुछभीतोअपनेपासनहींजुज़-मता-ए-दिल
क्याइससेबढ़केऔरभीकोईहैइम्तिहाँ
लिखनेकोलिखरहेहैंग़ज़बकीकहानियाँ
लिक्खीजासकीमगरअपनीहीदास्ताँ
दिलसेदिमाग़हल्क़ा-ए-इरफ़ाँसेदारतक
हमख़ुदकोढूँडतेहुएपहुँचेकहाँकहाँ
उसबे-वफ़ापेबसनहींचलतातोक्याहुआ
उड़तीरहेंगीअपनेगरेबाँकीधज्जियाँ
हमख़ुदहीकरतेरहतेहैंफ़ित्नोंकीपरवरिश
आतीनहींहैकोईबलाहमपेना-गहाँ
  - Ibn-e-Safi
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