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Shariq Kaifi
humeen tak rah gaya qissa hamaara
humeen tak rah gaya qissa hamaara | हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
- Shariq Kaifi
हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
मु'आफ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
- Shariq Kaifi
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तुम्हें
लौटा
रहा
हूँ
ख़त
तुम्हारे
कभी
तुम
क्या
थीं
ख़ुद
ही
देख
लेना
Gaurav Trivedi
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ले
के
ख़त
उन
का
किया
ज़ब्त
बहुत
कुछ
लेकिन
थरथराते
हुए
हाथों
ने
भरम
खोल
दिया
Jigar Moradabadi
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चिट्ठी
लिखने
में
इक
मुद्दत
लगती
है
पढ़ने
वाला
मिनटों
में
पढ़
लेता
है
Satya Prakash Soni
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तुम्हारे
ख़त
में
नया
इक
सलाम
किसका
था
न
था
रक़ीब
तो
आख़िर
वो
नाम
किसका
था
Dagh Dehlvi
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ये
तेरे
ख़त
ये
तेरी
ख़ुशबू
ये
तेरे
ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ
हैं
तेरे
कौल
और
क़सम
की
तरह
गुज़िश्ता
साल
मैंने
इन्हें
गिनकर
रक्खा
था
किसी
ग़रीब
की
जोड़ी
हुई
रक़म
की
तरह
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Jaun Elia
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प्यार
का
पहला
ख़त
लिखने
में
वक़्त
तो
लगता
है
नए
परिंदों
को
उड़ने
में
वक़्त
तो
लगता
है
Hastimal Hasti
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वो
तड़प
जाए
इशारा
कोई
ऐसा
देना
उस
को
ख़त
लिखना
तो
मेरा
भी
हवाला
देना
Azhar Inayati
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तुम्हें
लहू
से
तो
ख़त
लिख
नहीं
सके
लेकिन
लिखी
है
आँख
के
पानी
से
शा'इरी
तुम
पर
Manmauji
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'आशिक़
का
ख़त
है
पढ़ना
ज़रा
देख-भाल
के
काग़ज़
पे
रख
दिया
है
कलेजा
निकाल
के
LALA RAKHA RAM BARQ
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तेरे
वादों
को
फिर
से
पढ़
रहा
हूँ
तेरे
ख़त
पानी
पानी
हो
रहे
हैं
Harman Dinesh
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सब
आसान
हुआ
जाता
है
मुश्किल
वक़्त
तो
अब
आया
है
जिस
दिन
से
वो
जुदा
हुआ
है
मैं
ने
जिस्म
नहीं
पहना
है
कोई
दराड़
नहीं
है
शब
में
फिर
ये
उजाला
सा
कैसा
है
बरसों
का
बछड़ा
हुआ
साया
अब
आहट
ले
कर
लौटा
है
अपने
आप
से
डरने
वाला
किस
पे
भरोसा
कर
सकता
है
एक
महाज़
पे
हारे
हैं
हम
ये
रिश्ता
क्या
कम
रिश्ता
है
क़ुर्ब
का
लम्हा
तो
यारों
को
चुप
करने
में
गुज़र
जाता
है
सूरज
से
शर्तें
रखता
हूँ
घर
में
चराग़
नहीं
जलता
है
दुख
की
बात
तो
ये
है
'शारिक़'
उस
का
वहम
भी
सच
निकला
है
बरसों
का
बछड़ा
हुआ
साया
अब
आहट
ले
कर
लौटा
है
अपने
आप
से
डरने
वाला
किस
पे
भरोसा
कर
सकता
है
एक
महाज़
पे
हारे
हैं
हम
ये
रिश्ता
क्या
कम
रिश्ता
है
क़ुर्ब
का
लम्हा
तो
यारों
को
चुप
करने
में
गुज़र
जाता
है
सूरज
से
शर्तें
रखता
हूँ
घर
में
चराग़
नहीं
जलता
है
दुख
की
बात
तो
ये
है
'शारिक़'
उस
का
वहम
भी
सच
निकला
है
.
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Shariq Kaifi
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सभी
से
राज़
कह
देता
हूँ
अपने
न
जाने
क्या
छुपाना
चाहता
हूँ
Shariq Kaifi
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पहली
बार
वो
ख़त
लिक्खा
था
जिस
का
जवाब
भी
आ
सकता
था
ख़ुद
अफ़्वाह
उड़ाता
था
मैं
ख़ुद
ही
यक़ीं
भी
कर
लेता
था
उस
से
कहो
उस
रूप
में
आए
जैसा
पहली
नज़र
में
लगा
था
भूल
चुका
था
दे
के
सदा
मैं
तब
जंगल
का
जवाब
आया
था
हम
तो
पराए
थे
इस
घर
में
हम
से
कौन
ख़फ़ा
होता
था
टूट
गए
इस
कोशिश
में
हम
अपनी
तरफ़
झुकना
चाहा
था
उलझ
रही
थी
आँख
कहीं
पर
कोई
मुझे
पहचान
रहा
था
टूट
गया
फिर
ग़म
का
नशा
भी
दुख
कितना
सुख
दे
सकता
था
जगह
जगह
से
टूट
रहा
हूँ
किस
ने
मुझे
छू
कर
देखा
था
कितने
सच्चे
दिल
से
हम
ने
अपना
अपना
झूट
कहा
था
पहली
बार
मैं
उस
की
ख़ातिर
अपने
लिए
कुछ
सोच
रहा
था
इतने
समझाने
वाले
थे
मैं
कुछ
कैसे
समझ
सकता
था
बड़ी
बड़ी
आँखों
में
उस
की
कोई
सवाल
हुआ
करता
था
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Shariq Kaifi
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फिर
तुम्हारे
बराबर
खड़ा
शख़्स
कुछ
इस
तरह
से
हँसा
जैसे
तुमने
बताया
हो
उस
को
है
ये
भी
दीवाना
मेरा
Shariq Kaifi
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एक
दिन
हम
अचानक
बड़े
हो
गए
खेल
में
दौड़कर
उसको
छूते
हुए
Shariq Kaifi
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