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Shariq Kaifi
pahli baar vo khat likkha tha
pahli baar vo khat likkha tha | पहली बार वो ख़त लिक्खा था
- Shariq Kaifi
पहली
बार
वो
ख़त
लिक्खा
था
जिस
का
जवाब
भी
आ
सकता
था
ख़ुद
अफ़्वाह
उड़ाता
था
मैं
ख़ुद
ही
यक़ीं
भी
कर
लेता
था
उस
से
कहो
उस
रूप
में
आए
जैसा
पहली
नज़र
में
लगा
था
भूल
चुका
था
दे
के
सदा
मैं
तब
जंगल
का
जवाब
आया
था
हम
तो
पराए
थे
इस
घर
में
हम
से
कौन
ख़फ़ा
होता
था
टूट
गए
इस
कोशिश
में
हम
अपनी
तरफ़
झुकना
चाहा
था
उलझ
रही
थी
आँख
कहीं
पर
कोई
मुझे
पहचान
रहा
था
टूट
गया
फिर
ग़म
का
नशा
भी
दुख
कितना
सुख
दे
सकता
था
जगह
जगह
से
टूट
रहा
हूँ
किस
ने
मुझे
छू
कर
देखा
था
कितने
सच्चे
दिल
से
हम
ने
अपना
अपना
झूट
कहा
था
पहली
बार
मैं
उस
की
ख़ातिर
अपने
लिए
कुछ
सोच
रहा
था
इतने
समझाने
वाले
थे
मैं
कुछ
कैसे
समझ
सकता
था
बड़ी
बड़ी
आँखों
में
उस
की
कोई
सवाल
हुआ
करता
था
- Shariq Kaifi
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जमाना
भूल
पायेगा
नहीं
अपनी
मुहब्बत
छपेंगे
क्लास
दसवीं
में
सभी
किस्से
हमारे
Shubham Seth
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सारे
ग़म
भूल
गए
आपके
रोने
पे
मुझे
किसको
ठंडक
में
पसीने
का
ख़्याल
आता
है
आखरी
उम्र
में
जाते
है
मदीने
हम
लोग
मरने
लगते
है
तो
जीने
का
ख़याल
आता
है
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Nadir Ariz
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रोज़
मेरे
घर
की
जिम्मेदारियाँ
मुझ
को
आ
कर
भूल
जाने
का
तुझे
अब
मशवरा
दे
रही
हैं
Faiz Ahmad
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गुलाब
जैसे
होंठो
ने
छुआ
था
गालों
को
इसीलिए
न
भूल
पाया
बीते
सालों
को
Nirbhay Nishchhal
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हमने
सब
सीखा
था
उसके
ख़ातिर
बस
भूल
उसे
ख़ुद
जीना
सीख
नहीं
पाए
Surya Tiwari
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आसमाँ
इतनी
बुलंदी
पे
जो
इतराता
है
भूल
जाता
है
ज़मीं
से
ही
नज़र
आता
है
Waseem Barelvi
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अब
तो
हर
बात
याद
रहती
है
ग़ालिबन
मैं
किसी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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याद
भूले
हुए
लोगों
को
किया
जाता
है
भूल
जाओ
कि
तुम्हें
याद
किया
जाएगा
Charagh Sharma
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या'नी
तुम
वो
हो
वाक़ई
हद
है
मैं
तो
सच-मुच
सभी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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मैं
भूल
चुका
हूँ
कि
ये
वनवास
है
वन
है
इस
वक़्त
मेरे
सामने
सोने
का
हिरन
है
मैं
ध्यान
से
कुछ
सुन
ही
नहीं
पाऊँगा
सरकार
मैं
क्या
ही
बताऊँ
कि
मेरा
ध्यान
मगन
है
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Vikram Gaur Vairagi
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हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
पढ़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
की
अभी
उतरा
नहीं
बस्ता
हमारा
मुआ'फ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
किसी
को
फिर
भी
महँगे
लग
रहे
थे
फ़क़त
साँसों
का
ख़र्चा
था
हमारा
यहीं
तक
इस
शिकायत
को
न
समझो
ख़ुदा
तक
जाएगा
झगड़ा
हमारा
तरफ़-दारी
नहीं
कर
पाए
दिल
की
अकेला
पड़
गया
बंदा
हमारा
तआ'रुफ़
क्या
करा
आए
किसी
से
उसी
के
साथ
है
साया
हमारा
नहीं
थे
जश्न-ए-याद-ए-यार
में
हम
सो
घर
पर
आ
गया
हिस्सा
हमारा
हमें
भी
चाहिए
तन्हाई
'शारिक़'
समझता
ही
नहीं
साया
हमारा
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Shariq Kaifi
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सच
तो
बैठ
के
खाता
है
झूठ
कमा
कर
लाता
है
याद
भी
कोई
आता
है
याद
तो
रक्ख
जाता
है
जैसे
लफ़्ज़
हों
वैसा
ही
मुँह
का
मज़ा
हो
जाता
है
फिर
दुश्मन
बढ़
जाएँगे
किस
को
दोस्त
बनाता
है
कैसी
ख़ुश्क
हवाएँ
हैं
सुब्ह
से
दिन
चढ़
जाता
है
उसे
घटा
कर
दुनिया
में
बाक़ी
क्या
रह
जाता
है
जाने
वो
इस
चेहरे
पर
किस
का
धोका
खाता
है
इश्क़
से
बढ़
कर
कौन
हमें
दुनियादार
बनाता
है
दिल
जैसा
मासूम
भी
आज
अपनी
अक़्ल
चलाता
है
कुछ
तो
है
जो
सिर्फ़
यहाँ
मेरी
समझ
में
आता
है
मुश्किल
सुन
ली
जाती
है
कोई
करम
फ़रमाता
है
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Shariq Kaifi
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उस
धोके
ने
तोड़
दिया
है
इतना
मुझ
को
अब
कुछ
भी
समझा
लेती
है
दुनिया
मुझ
को
Shariq Kaifi
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इश्क़
कहाँ
अब
पहले
वाला
होता
है
इश्क़
से
बढ़कर
इश्क़
का
चर्चा
होता
है
Shariq Kaifi
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यूँँ
भी
सहरा
से
हम
को
रग़बत
है
बस
यही
बे-घरों
की
इज़्ज़त
है
अब
सँवरने
का
वक़्त
उस
को
नहीं
जब
हमें
देखने
की
फ़ुर्सत
है
तुझ
से
मेरी
बराबरी
ही
क्या
तुझ
को
इंकार
की
सुहूलत
है
क़हक़हा
मारिए
में
कुछ
भी
नहीं
मुस्कुराने
में
जितनी
मेहनत
है
सैर-ए-दुनिया
को
आ
तो
जाओ
मगर
वापसी
में
बड़ी
मुसीबत
है
ये
जो
इक
शक्ल
मिल
गई
है
मुझे
ये
भी
आईने
की
बदौलत
है
ये
तिरे
शहर
में
खुला
मुझ
पर
मुस्कुराना
भी
एक
आदत
है
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Shariq Kaifi
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