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Shariq Kaifi
yuñ bhi sehra se ham ko raghbat hai
yuñ bhi sehra se ham ko raghbat hai | यूँँ भी सहरा से हम को रग़बत है
- Shariq Kaifi
यूँँ
भी
सहरा
से
हम
को
रग़बत
है
बस
यही
बे-घरों
की
इज़्ज़त
है
अब
सँवरने
का
वक़्त
उस
को
नहीं
जब
हमें
देखने
की
फ़ुर्सत
है
तुझ
से
मेरी
बराबरी
ही
क्या
तुझ
को
इंकार
की
सुहूलत
है
क़हक़हा
मारिए
में
कुछ
भी
नहीं
मुस्कुराने
में
जितनी
मेहनत
है
सैर-ए-दुनिया
को
आ
तो
जाओ
मगर
वापसी
में
बड़ी
मुसीबत
है
ये
जो
इक
शक्ल
मिल
गई
है
मुझे
ये
भी
आईने
की
बदौलत
है
ये
तिरे
शहर
में
खुला
मुझ
पर
मुस्कुराना
भी
एक
आदत
है
- Shariq Kaifi
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प्यार
दो
बार
थोड़ी
होता
है
हो
तो
फिर
प्यार
थोड़ी
होता
है
यही
बेहतर
है
तुम
उसे
रोको
मुझ
सेे
इनकार
थोड़ी
होता
है
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Zubair Ali Tabish
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मेरी
ख़ामोशियों
में
लर्ज़ां
है
मेरे
नालों
की
गुम-शुदा
आवाज़
Faiz Ahmad Faiz
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करने
को
कुछ
नहीं
है
नए
साल
में
'यशब'
क्यूँ
न
किसी
से
तर्क-ए-मोहब्बत
ही
कीजिए
Yashab Tamanna
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मुन्सिफ़
हो
अगर
तुम
तो
कब
इंसाफ़
करोगे
मुजरिम
हैं
अगर
हम
तो
सज़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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बाज़ार
जा
के
ख़ुद
का
कभी
दाम
पूछना
तुम
जैसे
हर
दुकान
में
सामान
हैं
बहुत
आवाज़
बर्तनों
की
घर
में
दबी
रहे
बाहर
जो
सुनने
वाले
हैं,
शैतान
हैं
बहुत
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Aalok Shrivastav
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आवाज़
दे
के
देख
लो
शायद
वो
मिल
ही
जाए
वर्ना
ये
उम्र
भर
का
सफ़र
राएगाँ
तो
है
Muneer Niyazi
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'मीर'
के
दीन-ओ-मज़हब
को
अब
पूछते
क्या
हो
उन
ने
तो
क़श्क़ा
खींचा
दैर
में
बैठा
कब
का
तर्क
इस्लाम
किया
Meer Taqi Meer
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तेरी
आवाज़
को
इस
शहर
की
लहरें
तरसती
हैं
ग़लत
नंबर
मिलाता
हूँ
तो
पहरों
बात
होती
है
Ghulam Mohammad Qasir
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तेरा
लिक्खा
जो
पढ़ूँ
तो
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तो
तेरा
चेहरा
देखूँ
Bhaskar Shukla
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हमने
सोचा
है
इसके
बारे
में,
कुछ
मुनाफ़ा
है
इस
खसारे
में
मैं
तो
ख़्वाबों
से
तर्क
करता
था,
कुछ
न
कुछ
बात
है
तुम्हारे
में
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Vishal Singh Tabish
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उस
धोके
ने
तोड़
दिया
है
इतना
मुझ
को
अब
कुछ
भी
समझा
लेती
है
दुनिया
मुझ
को
Shariq Kaifi
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दिलों
पर
नक़्श
होना
चाहता
हूँ
मुकम्मल
मौत
से
घबरा
रहा
हूँ
सभी
से
राज़
कह
देता
हूँ
अपने
न
जाने
क्या
छुपाना
चाहता
हूँ
तवज्जोह
के
लिए
तरसा
हूँ
इतना
कि
इक
इल्ज़ाम
पर
ख़ुश
हो
रहा
हूँ
मुझे
महफ़िल
के
बाहर
का
न
जानो
मैं
अपना
जाम
ख़ाली
कर
चुका
हूँ
ये
आदत
भी
उसी
की
दी
हुई
है
कि
सब
को
मुस्कुरा
कर
देखता
हूँ
अलग
होती
है
हर
लम्हे
की
दुनिया
पुराना
हो
के
भी
कितना
नया
हूँ
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Shariq Kaifi
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उसे
यूँँ
चेहरा-चेहरा
ढूँढता
हूँ
वो
जैसे
रात-दिन
सड़कों
पे
होगा
Shariq Kaifi
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मिले
तो
कुछ
बात
भी
करोगे
कि
बस
उसे
देखते
रहोगे
Shariq Kaifi
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शाम
से
छत
पर
घुम
रहा
हूँ
एक
दिए
के
आगे-पीछे
Shariq Kaifi
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