ik pal bhi kahii raahat-o-aaraam nahin hai | इक पल भी कहीं राहत-ओ-आराम नहीं है

  - Gauhar Shaikh Purwi
इकपलभीकहींराहत-ओ-आरामनहींहै
येइश्क़काआग़ाज़हैअंजामनहींहै
डरताहूँकिगर्दिशज़मानेकीठहरजाए
अबहाथमेंसूरजहैमिरेजामनहींहै
क्यालूटलियारिंदोंनेमय-ख़ानाहीसारा
यामेरीहीक़िस्मतमेंकोईजामनहींहै
जिसपापकीदुनियामेंहैरावनकाबसेरा
उसस्वर्गसीधरतीपेकोईरामनहींहै
मैंनेहीनिखाराहैतिरारंग-ए-मोहब्बत
औरमेरातिरीबज़्ममेंकुछकामनहींहै
तुमनेहीसितमढाएहैंतुमनेहीजफ़ाकी
मैंकैसेकहूँतुमपेकुछइल्ज़ामनहींहै
सबकुछहैजबअपनाहीतोमैंसोचरहाहूँ
इंसानकोक्यूँपहलासाआरामनहींहै
मेरेहीगुनाहोंपेनज़रक्यूँहैजहाँकी
हैकौनजोइसदौरमेंबदनामनहींहै
हैरतहैकितूउसकोनहींजानतालेकिन
इसशहरमें'गौहर'कोईगुम-नामनहींहै
  - Gauhar Shaikh Purwi
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