sabhi samton ko thukra kar udri jaa.e | सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए

  - Chandra Parkash Shad
सभीसम्तोंकोठुकराकरउड़ीजाए
कहाँतकजानेगर्द-ए-गुम-रहीजाए
बचाकरअपनेसाएकोकहाँरख्खूँ
किशबतोहरतरफ़कोफैलतीजाए
कोईदीवारहैतेरीसमाअतभी
किजोआवाज़आएलौटतीजाए
पहरोंलिखसकूँमैंकोईबातअपनी
अजबसीगर्दकाग़ज़परजमीजाए
अचानकटूटजाएक़स्र-ए-तन्हाई
कोईआवाज़खिड़कीखोलतीजाए
सुनाहैमैंसदाओंकासमुंदरहूँ
येसन्नाटाकहींमुझकोपीजाए
वहाँबसनेकीख़्वाहिशमुँहतकेमेरा
इमारतबनतेबनतेटूटतीजाए
उभरतेजाएँरंगोंकेखुलेमंज़र
मगरबे-फ़ुर्सतीआँखोंकोसीजाए
यूँँहीखपतेजाएँरोज़-ओ-शबमेंहम
कभीतोबातबे-मौसमभीकीजाए
येतुमकिसकेलिएजलतेहोगोशोंमें
चलोछतपरसड़कतकरौशनीजाए
  - Chandra Parkash Shad
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