zabaan ko rakh ke andar bolta hai | ज़बाँ को रख के अंदर बोलता है

  - Dharmesh bashar
ज़बाँकोरखकेअंदरबोलताहै
वोचुपरहकरभीअक्सरबोलताहै
यहीएहसास-ए-दिलहोताहैअक्सर
कोईहैजोकिअंदरबोलताहै
मुहब्बतसेइसेमैंनेतराशा
तभीतोबुतकापत्थरबोलताहै
तड़पउठताहैदिलतोक्यात'अज्जुब
सर-ए-तूफ़ाँसमुंदरबोलताहै
बुझालेतिश्नगीरूह-ए-तिश्ना
जिनाँमेंआब-ए-कौसरबोलताहै
नहींअल्फ़ाज़कामोहताजजज़्बा
किचुपरहकरभीशायरबोलताहै
किसीसेपूछनेकीक्याज़रूरत
हैक्यामाहौलख़ुदघरबोलताहै
नगरमेंकौनपहचानेमकींको
मकाँकासिर्फ़नंबरबोलताहै
भलेहीचुप'बशर'दुश्मनकेआगे
मगरहाथोंमेंपत्थरबोलताहै
  - Dharmesh bashar
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