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anupam shah
mausam p mira koi ikhtiyaar nahin hai
mausam p mira koi ikhtiyaar nahin hai | मौसम प' मिरा कोई इख़्तियार नहीं है
- anupam shah
मौसम
प'
मिरा
कोई
इख़्तियार
नहीं
है
अब
की
ख़िज़ाँ
के
बाद
में
बहार
नहीं
है
वा'दा
लबों
पे
है
जो
निगाहों
में
नहीं
है
बोसा
तो
दे
दिया
यूँँ
मगर
प्यार
नहीं
है
- anupam shah
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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तेरी
हर
बात
मोहब्बत
में
गवारा
कर
के
दिल
के
बाज़ार
में
बैठे
हैं
ख़सारा
कर
के
आसमानों
की
तरफ़
फेंक
दिया
है
मैं
ने
चंद
मिट्टी
के
चराग़ों
को
सितारा
कर
के
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Rahat Indori
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ऐसी
तारीकियाँ
आँखों
में
बसी
हैं
कि
'फ़राज़'
रात
तो
रात
है
हम
दिन
को
जलाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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तमाम
बातें
जो
चाहता
था
मैं
तुम
सेे
कहना
वो
एक
काग़ज़
पे
लिख
के
काग़ज़
जला
दिया
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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बीस
बरस
से
इक
तारे
पर
मन
की
जोत
जगाता
हूँ
दीवाली
की
रात
को
तू
भी
कोई
दिया
जलाया
कर
Majid Ul Baqri
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दिल
का
गुलाब
मैं
ने
जिसे
चूम
कर
दिया
उस
ने
मुझे
बहार
से
महरूम
कर
दिया
Anjum Barabankvi
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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खो
दिया
तुम
को
तो
हम
पूछते
फिरते
हैं
यही
जिस
की
तक़दीर
बिगड़
जाए
वो
करता
क्या
है
Firaq Gorakhpuri
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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पुरानी
बात
पर
कब
तक
नए
क़िस्से
बिगाड़ोगे
समर
न
दे
सका
तो
क्या
दरख़्तों
को
जला
दोगे
anupam shah
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क्या
हुआ
वास्ते
किसके
तू
रो
गया
जो
तेरा
था
नहीं
वो
कहीं
खो
गया
इश्क़
उसका
ही
सच्चा
हुआ
है
यहाँ
प्यार
में
खो
गया
प्यार
ही
हो
गया
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anupam shah
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मैं
कहाँ
का
था
कहाँ
का
कर
गए
कितना
तुम
मेरा
मुनाफ़ा
कर
गए
ग़म
मिटाने
आए
थे
तुम
तो
मिरे
तुम
मिरे
ग़म
में
इज़ाफ़ा
कर
गए
पूछते
थे
साथ
दोगे
उम्र
भर
जो
मुझे
अब
बेसहारा
कर
गए
जो
दु'आ
थी
बद्दुआ
जैसी
लगी
आप
कैसा
इस्तिख़ारा
कर
गए
सामने
दरिया
था
और
प्यासा
था
मैं
और
वो
मुझ
सेे
किनारा
कर
गए
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anupam shah
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बचाता
कब
तलक
मैं
एक
रिश्ता
तुम्हें
पाता
तो
घर
कैसे
बचाता
anupam shah
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इश्क़
का
ज़ख़्म
ताज़ा
हरा
कर
लिया
एक
इल्ज़ाम
था
हमने
जो
सर
लिया
हमने
सोचा
नहीं
इश्क़
में
फिर
नफ़ा
राह
में
जो
मिला
बाँह
में
भर
लिया
आप
पिघले
नहीं
देखकर
अश्क़
ये
एक
पत्थर
को
हमने
सनम
कर
लिया
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anupam shah
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