husn un ka apne zauq-e-deed men paata hooñ main | हुस्न उन का अपने ज़ौक़-ए-दीद में पाता हूँ मैं

  - Ali Manzoor Hyderabadi
हुस्नउनकाअपनेज़ौक़-ए-दीदमेंपाताहूँमैं
सामनेहोकरवोछुपतेहैंतड़पजाताहूँमैं
इशरत-ए-जल्वाभीहोजाएजहाँहैरत-ज़दा
ख़याल-ए-दोस्तउसमंज़िलपेघबराताहूँमैं
देखताहूँअपनेग़म-ख़्वारोंकीजबबे-दर्दियाँ
हुस्न-ए-बेपर्दाकीरहरहकरक़समखाताहूँमैं
इंतिज़ारउसकाहैकितनाजाँ-गुसिलक्यूँँकरकहूँ
ख़तमेंजिसकानामहीलिखकरतड़पजाताहूँमैं
कबसँभलनेदेगीग़शसेउनकीचश्म-ए-बर्क़-पाश
मुज़्दाबादा-ए-बे-ख़ुदीआतेहैंवोजाताहूँमैं
बे-ख़यालीमेंकभीअपनीज़बान-ए-हालसे
ख़स्ता-हालीकेमज़ेउनकोभीसमझाताहूँमैं
आहअबतककीनहींसैर-ए-बहारिस्तान-ए-दिल
इकख़यालीरौमेंहमदमबहाजाताहूँमैं
हैरत-अफ़्ज़ाहैमिराइश्क़-ए-मोहब्बत-आफ़रीं
ख़ुदहीअबमुज़्तरनहींउनकोभीतड़पाताहूँमैं
रास्ताछोड़तग़ाफ़ुलमेरेघरआतेहैंवो
रहबरीकरतमन्नाउनकेघरजाताहूँमैं
हैरत-ए-मश्क़-ए-तसव्वुरखोदेमुझकोकहीं
सामनेअपनेतुझेदिल-नशींपाताहूँमैं
लारहीहैउनकीचश्म-ए-लुत्फ़इशरतकेपयाम
देख'मंज़ूर'अबकैसानज़रआताहूँमैं
  - Ali Manzoor Hyderabadi
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