baitha hooñ apni zaat ka naqsha nikaal ke | बैठा हूँ अपनी ज़ात का नक़्शा निकाल के

  - Akram Jazib
बैठाहूँअपनीज़ातकानक़्शानिकालके
इकबे-ज़मीनहारीहूँसहरानिकालके
ढूँडाबहुतमगरकोईरस्तानहींमिला
इसज़िंदगीसेतेराहवालानिकालके
अलमारीसेमिलेमुझेपहलेपहलकेख़त
बैठाहुआहूँआपकावा'दानिकालके
वीरानियोंपेआँखछमा-छमबरसपड़ी
लायाहूँमैंतोदश्तसेदरियानिकालके
आसानियाँहीसोचतेरहतेहैंयारलोग
उक़्बानिकालकरकभीदुनियानिकालके
हमरफ़्तगाँसेहटकेभीदेखेंतोशे'रमें
मौज़ूअ'कमहीबचतेहैंनौहानिकालके
मिलनाकहाँथासहलदर-ए-आगहीमुझे
आयाहूँमैंपहाड़सेरस्तानिकालके
वाइ'ज़निहालआजख़ुशीसेहैकिसक़दर
इकताज़ाइख़्तिलाफ़कानुक्तानिकालके
मुनइ'मकोउसनिवालेकीलज़्ज़तकाक्यापता
मज़दूरजोकमाएपसीनानिकालके
हालातक्याग़रीबकेबदलेकिहरकोई
लेआयाहैक़रीबकारिश्तानिकालके
'जाज़िब'कहाँख़बरथीकिहैबाज़ताकमें
हमशादथेक़फ़ससेपरिंदानिकालके
  - Akram Jazib
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