mirii nigaah men hai KHaak seem-o-zar ka fusoon | मिरी निगाह में है ख़ाक सीम-ओ-ज़र का फ़ुसूँ

  - Akhtar Saeed
मिरीनिगाहमेंहैख़ाकसीम-ओ-ज़रकाफ़ुसूँ
सुबूत-ए-मो'जिज़ा-ए-रफ़्तगान-ए-आलमहूँ
दियाहैमुझकोमगरबे-सुरूरहंगामा
मिलाहैमुझकोमगरवक़्फ़-ए-इज़्तिराब-ए-सुकूँ
चाँदमेंहैचमकअपनीऔरशबनममें
करूँँतोकिसकाज़मानेमेंए'तिबारकरूँँ
जोदिलमेंबातहैअल्फ़ाज़मेंनहींआती
सोएकबातहैदिलकीलगीकहूँकहूँ
सज़ाहैमेरीरहोउसदयारमेंकिजहाँ
गराँहैआब-ए-मुसफ़्फ़ामगरहैअर्ज़ांख़ूँ
सवाल-ए-अक़्लवहीहैजवाब-ए-जेहलवही
हज़ारबारकरूँँदसहज़ारबारसुनूँ
ख़फ़ाहैरंग-ए-गुल-ओ-मौजा-ए-सबामुझसे
किबाँधताहूँदिल-ए-बे-क़रारकामज़मूँ
मुझेतोअपनेपेइकलम्हाए'तिबारनहीं
निगार-ए-दहरतुझेगरचेबा-वफ़ासमझूँ
हज़ाररास्तेपिन्हाँहैंरेग-ए-सहरामें
जोदममेंदमहोतोइसदश्तकीहवादेखूँ
खुलाहैआल-ए-मोहम्मदकेफ़ैज़सेमुझपर
किआदमीकोभीहैइख़्तियार-ए-कुन-फ़यकूँ
बुलंदबा'द-ए-शहादतभीहैयेनोक-ए-सिनाँ
सर-ए-इमामकिसीहालभीनहींहैनिगूँ
  - Akhtar Saeed
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