dil ke rahne ke li.e shehr-e-khayaalaat nahin | दिल के रहने के लिए शहर-ए-ख़यालात नहीं

  - Akhtar Saeed
दिलकेरहनेकेलिएशहर-ए-ख़यालातनहीं
सर-ब-सरहैनफ़ीइसमेंकहींइसबातनहीं
रंजगरवाँसेतोराहतभीवहींसेआवे
कौनकहताहैयहाँवहदत-ए-आयातनहीं
मुझसेकहतेहैंहवाएजसेसरोकाररख
मेरीता'रीफ़ब-जुज़क़िस्सा-ए-हाजातनहीं
कोईबतलाओशब-ओ-रोज़पेक्यागुज़रीहै
रातख़ामोशनहींदिनमेंकोईबातनहीं
थीफ़लातूँकीजोजम्हूरसेरु-गर्दानी
हमसमझतेथेख़ुराफ़ातख़ुराफ़ातनहीं
दिलसेगुज़रेकभीदुश्मनकेलिएफ़िक्र-ए-ज़रर
वोवतीरानहींमेरामिरेजज़्बातनहीं
अहद-ए-बे-मेहरमेंइकचालमोहब्बतभीचले
शहमेंबाज़ीहैमिरीगरचेअभीमातनहीं
साहिबादेखनाहदसेबढ़ेयूरिश-ए-ग़म
ना-तवाँदिलहैमिराखेमा-ए-सादातनहीं
  - Akhtar Saeed
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